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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ १७. सारग्राही का अंग)
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*दादू साधु गुण गहै, औगुण तजै विकार ।*
*मानसरोवर हंस ज्यूं, छाड़ि नीर, गहि सार ॥२॥*
सार असार का विवेक करने वाले महात्मा हंस के समान होते हैं । जैसे हंस क्षीर नीर का विवेक कर के पानी को छोड़ कर दुग्ध ही पीता है, वैसे ही सारग्राही महात्मा भी दूसरे के अवगुण और विकारों को त्यागकर गुणों को ही ग्रहण करते हैं ।
विष्णुपुराण में लिखा है- अर्थात् जो जितेन्द्रिय पुरुष दोषों के कारणों को जानकर त्याग देता है, उसकी धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इनमें जरा सी भी हानि नहीं होती अर्थात् उसके धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष सब सिद्ध हो जाते हैं ।
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*हंस गियानी सो भला, अन्तर राखे एक ।*
*विष में अमृत काढ ले, दादू बड़ा विवेक ॥३॥*
जो विवेकी पुरुष हंस की तरह अनात्म देहादिरूप संसार के विषय रूपी विष में से ही आत्मस्वरूप अमृत को निकाल कर उसी आत्मा का अपने हृदय में चिन्तन करता है, वही ज्ञानी महात्मा होता है ।
वेदान्त संदर्भ में – विद्वान् को चाहिये कि बन्ध की निवृत्ति के लिये आत्मा अनात्मा का विवेक करना चाहिये जिससे उस सच्चिदानन्द को जानकर आनन्दित हो जायें ।
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*पहली न्यारा मन करै, पीछै सहज शरीर ।*
*दादू हंस विचार सौं, न्यारा किया नीर ॥४॥*
पहले विषयवासनाओं से मन को प्रत्याहार द्वारा अलग करके बाद में विचार के द्वारा देह आदि पदार्थों में अहंता ममता को त्यागकर जैसे हंस दूध को अलग कर लेता है, वैसे ही दुग्ध की तरह शुद्ध आत्मा को अलग करके उसके ध्यान करते हुए साधक मुक्त हो जाता है ।
लिखा है कि- मनुष्य विषयों में आसक्त मन को उनसे अलग करके ब्रह्म में लीन कर दे तो कहो, कौन साधक मुक्त नहीं होगा ?
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*आपै आप प्रकाशिया, निर्मल ज्ञान अनन्त ।*
*क्षीर नीर न्यारा किया, दादू भज भगवंत ॥५॥*
जैसे हंस दूध से पानी को अलग करके दूध को पी जाता है, वैसे ही साधक भगवान् को भजता हुआ अपने विचार से अनात्मा का तिरस्कार करके अपने आत्मस्वरूप में स्थित रहता है तो उसको अनन्त निर्मल ब्रह्म का प्रकाश स्वयं ही प्राप्त हो जाता है । वेदान्तसंदर्भ में लिखा है कि तमोगुण से अत्यन्त मूढ बुद्धि के द्वारा शरीर में अहंभाव हो रहा है, उसका निःशेषतया यदि नाश हो जाय तो उसको प्रतिबन्धरहित ब्रह्मात्मभाव की प्राप्ति हो जाती है ।
(क्रमशः)

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