बुधवार, 19 अगस्त 2020

= ६९ =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*दादू जिन कंकर पत्थर सेविया,*
*सो अपना मूल गँवाइ ।*
*अलख देव अंतर बसै, क्या दूजी जगह जाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साँच का अंग)*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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समरसिंह चितौड़ के एक सरदार का पुत्र था तथा वीरता के लिये प्रसिद्ध था । विद्युलता चितौड़ के एक वीर सैनिक की पुत्री थी । इन दोनों के विवाह के समय चितौड़ पर अलाउदीन ने आक्रमण किया । समरसिंह के युद्ध में जाने से विवाह रुक गया । समरसिंह ने यह सोच कर कि हमारी विजय होना कठिन है और मुझे जीवन बचाकर विद्युलता जो प्राप्त करना है । देश के साथ विश्वासधात करके अलाउदीन से मिल गया । 
चितौड़ का पतन हुआ । समरसिंह मुसलमान सैनिकों के साथ विद्युलता के पास गया । वह समझ गई और यह कहकर कि - "अधर्मी ! देशद्रोही ! मेरे शरीर को छूकर अपवित्र मत कर ।" अपनी छाती में कटार मारकर मर गयी । जिसके लिये समरसिंह ने देश के साथ विश्वासधात किया, वह प्राप्त न हो सकी और उसे पछताना पड़ा ।
भेदक भी फिर जलत है, जब हो हृदय विचार ।
विद्युलता को खो दुखी, समरसिंह सरदार ॥१७४॥

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