शनिवार, 22 अगस्त 2020

*श्री भक्तमाल-स्वरूप वर्णन*

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*दादू मुख दिखलाइ साधु का, जे तुमहिं मिलावै आइ ।*
*तुम मांही अन्तर करै, दई न दिखाइ ताहि ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,* 
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान* 
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*श्री भक्तमाल-स्वरूप वर्णन*
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*दीरघदास पढैनिशि वासर,*
*पाप हरे जग जाप करावे ।*
*जान हरी सनमान करै जन,*
*प्रीति धरै जग रीति मिटावे ॥*
*कौन असाधि सके उन भक्तन,*
*ठीक न ठाक मनो भय आवे ।*
*माल गले तिलकादिक भाल सु,*
*माल भगत्त बिना रुल जावे ॥८॥*
लौकिक दृष्टि से बड़े भक्तिमान दास भक्त हों, रात्रि दिन हरि यश पढ़ते हों, जगत के लोगों से जप करा कर उनके पापों को भी हरते हों, शास्त्र ज्ञान युक्त भी हों, पूजा द्वारा हरि का सन्मान भी करते हों, भक्तों की प्रीति भी हृदय में धारण करते हों, जगत की भोग प्रधान रीति को भी मिटा दिया हो, तो भी उन भक्तों की सेवा रूप उपासना कौन कर सकता है? कारण भक्तमाल के पढ़े सुने और मनन किये बिना भक्ति तथा भक्तों का यथार्थ स्वरूप जानना कठिन है, समझ में नहीं आता, विचार करते ही मन में भय आता है । गले में माला हो, ललाट पर तिलकादिक हों तो भी भक्तमाल के विचार बिना ऊपर के भक्ति के चिन्ह व्यर्थ ही सिद्ध होते हैं ।
(क्रमशः)

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