सोमवार, 31 अगस्त 2020

सारग्राही का अंग ११/१५

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ १७. सारग्राही का अंग)
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*उज्ज्वल करणी हंस है, मैली करणी काग ।*
*मध्यम करणी छाड़ि सब, दादू उत्तम भाग ॥११॥*
हंस की करणी उत्तम है । सूखे हाड़ों पर बैठना यह काक की करणी अपवित्र है । परदारा में जो कामी की आसक्ति है वह निन्द्य कर्म है अतः जो पुरुष हंस की तरह पवित्र कर्म करता है उसको धन्यवाद है । वह ही भाग्यवान् है । 
चाणक्यनीति में कहा है- जो गुणवान् और धर्मात्मा है उसी का जीवन वास्तविक जीवन है । गुणधर्म से रहित जीवन तो निष्फल है ।
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*दादू निर्मल करणी साधु की, मैली सब संसार ।*
*मैली मध्यम ह्वै गये, निर्मल सिरजनहार ॥१२॥*
सत्पुरुषों के कर्म सदा उत्तम होते हैं । उसी से वे परमात्मा को प्राप्त कर लेते हैं । संसारी पुरुषों के कर्म मलिन होते हैं । अतः वे उससे संसार में क्लेश पाते हैं क्योंकि जैसा कर्म होगा वैसी ही गति होगी । 
चाणक्यनीति में- “दुर्जन का संग त्यागो और साधु पुरुषों का संग करो । दिनरात पुण्य कर्म करो । संसार की अस्थिरता का विचार करो ।”
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*दादू करणी ऊपर जाति है, दूजा सोच निवार ।*
*मैली मध्यम ह्वै गये, उज्ज्वल ऊँच विचार ॥१३॥*
मनुष्यों की जाति भी कर्म से ही होती है । जैसे कोई ब्राह्मण यदि घड़ा बनाने का काम करता है तो उसको ब्राह्मण न कह कर कुम्हार ही कहते हैं । स्मृति में भी लिखा है कि संस्कार से ब्राह्मण कहलाता है । अतः अच्छे कर्म करने वाले अच्छी जाति के कहलाते हैं । 
श्रीमद्भागवत में लिखा है कि- बारह गुणों से युक्त भगवान् कमलनाभ के चरण कमलों से विमुख है तो उससे वह चाण्डाल श्रेष्ठ है जिसने अपने मन वचन कर्म धन और प्राण भगवान् के चरणों में समर्पित कर रखे हैं । क्योंकि वह चाण्डाल तो अपने कुल को पवित्र कर देता है और बडप्पन का अभिमान रखने वाला ब्राह्मण स्वयं को भी पवित्र नहीं कर सकता ।
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*उज्वल करणी राम है, दादू दूजा धंध ।*
*का कहिये समझै नहीं, चारों लोचन अंध ॥१४॥*
सर्वश्रेष्ठ कार्य तो हरिभजन ही है । अन्य कर्म तो सुख दुःख फल देने वाले हैं । हरिभक्ति से कर्म नष्ट हो जाते हैं । विचार दृष्टि से पुण्य भी दुःखरूप ही है । फिर भी संसारी मनुष्य ज्ञान देने पर भी उन कर्मों को नहीं छोड़ता क्योंकि वे विवेक विचार से रहित अन्धे के सदृश हैं । पापकर्म के दुःखरूपी फल को प्रत्यक्ष में देखते हुए भी उनको नहीं त्यागता । अतः विद्वान् मनुष्यों को चाहिये सब कर्मों के परिणाम का विचार कर ही कर्म करें । 
लिखा है कि- चाहे गुणवान् हो या बिना गुण का हो । उन कर्मों को करते समय विद्वान् पुरुष को उनके फल का विचार करके ही करना चाहिये । अन्यथा जल्दबाजी में बिना सोचे समझे कर्म करने पर हृदय में कांटों के चुभने जैसी पीड़ा होती है ।
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*दादू गऊ बच्छ का ज्ञान गहि, दूध रहै ल्यौ लाइ ।*
*सींग पूंछ पग परिहरै, अस्तन हि लागै धाइ ॥१५॥*
जैसे गाय का बछड़ा गाय के सींग, पूंछ, पैरों को छोड़कर उसके स्तनों को पकड़कर दूध पीता है, वैसे ही इस विराट् रूप ब्रह्म गाय के साधु स्तन हैं । साधक गाय के बछड़े की तरह सन्तरूपी स्तनों को पकड़कर उनके आश्रय से ज्ञानरुपी दुग्ध को पीकर ब्रह्मभाव को प्राप्त हो जाते हैं । अतः साधक को सत्संगति करनी चाहिये । लिखा है कि-
कल्पवृक्ष कल्पित पदार्थों को देता है । कामधेनु गौ भी संकल्प को ही पूरा कर सकती है । चिन्तामणि भी चिन्तित पदार्थों को ही पूर्ण कर सकती है । लेकिन सत्पुरुषों का संग सब कुछ देने में समर्थ है ।
(क्रमशः)

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