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*चोर न भावै चांदणां, जनि उजियारा होइ ।*
*सूते का सब धन हरूँ, मुझे न देखै कोइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साँच का अंग)*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु*, *चोरी*
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कुत्ते को हाथ से रोटी देने पर वह अपनी पूंछ को हिला हिला कर प्रसन्नता से खाता है और जब स्वयं चोरी करके उठा लाता है तब पूंछ को पिछले दोनों पैरों के बीच दबाकर चलता है और एकान्त में जाकर खाता है । दूसरे को देख के संकोच करता ।
चोर पशु भी होत है, देह दशा से ज्ञात ।
रोटी चोरत श्वान की, पूंछ न हिले विख्यात ॥९५॥

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