शुक्रवार, 28 अगस्त 2020

*५. परचा कौ अंग ~ ३३३/३६*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*५. परचा कौ अंग ~ ३३३/३६*
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मन हीं मन मंहि रांम कहि, मन मांहै मन लाइ ।
मन मांहै मन सेवि हरि, जगजीवन तहां आइ ॥३३३॥
संतजगजीवन जी कहते है कि मन में ही राम कहें । मन ही में मन लगाओ व्यर्थ बाहर मत भटकते रहो । संत कहते है मन ही मन प्रभु की सेवा करो तब स्वयं ईश्वर वहां आ जायेंगे ।
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इन्द्री सपरस४ पंच रहै, तहँ नित परसै रांम ।
कहि जगजीवन प्रेम रस, हरि हरि बांणी नांम ॥३३४॥
(४. सपरस - स्पर्श) 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि पांच इन्द्रियों को स्पर्श से जाना जा सकता है तो राम का स्पर्श तो हमें नित्य मिलता है । संत कहते हैं कि प्रेम से स्मरण करने राम का स्पर्श भी अनुभव होने लगता है ।
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जे मांहि मेलै सोइ बिष, रांम बिना कछु आंन ।
नख सिख नूर निवास भरि, जगजीवन एह ग्यांन ॥३३५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि राम नाम के अलावा हम जो भी अन्तर में रखते हैं वह विषय है जो विष जैसा है । संत कहते हैं कि नख से शिख तक उन्हीं परमात्मा को समाये रखो विषयों को परे करो यह ही ज्ञान है ।
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कोइ इक महली५ महल६ मैं, कोई खड़े दरबार७ ।
कहि जगजीवन सेज सुख, रांम परस लहै नार ॥३३६॥
(५. महली - राजप्रासाद में रहने वाला) {(६. महल - राजप्रासाद(=भगवान् का आवास)} {७. दरबार - राजसभा(=परमेश्वर परमात्मा का आराधना-स्थल)} 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कोइ तो महल में निवास करता है जो भोगी है और कोइ दरबार में खुश है । जो भक्त है वह प्रभु सानिध्य में ही खुश है ।
(क्रमशः)

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