शुक्रवार, 28 अगस्त 2020

*(“तृतीयोल्लास” ३७/३९)*

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
*(“तृतीयोल्लास” ३७/३९)* 
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*दोनों राजा दोनों संत*
अचिरज राव करे मन मांहीं ऐ तो मनिष भले कुछ नांहीं । 
दोऊ राव दोऊ हैं दासा, पंचम और नहीं को पासा ॥३७॥ 
जब राजा ने यह घटना देखी तो मन में आश्‍चर्य करते हुये सोचा कि ये तो साधारण मनुष्य नहीं है । वहां केवल दोनों राजा है और दो उनके नौकर है पांचवां आदमी उनके पास और कोई नहीं है ॥३७॥ 
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*संतों ने हाथी का रुप धरा*
बिलंद शरीर गयंद को धारा, धर्या जूमल को दई पछारा । 
पदमसिंघ राव तब भाजे, सहर यजावलि जाई विराजे ॥३८॥ 
उन दोनों सिद्घों ने उस समय विशाल हाथी का शरीर धारण कर लिया और धर्याजूमल को पकड़ नीचे पछाड़ लगा दी । यह देख कर राजा पदमसिंघ वहां से भाग लिया और अपने शहर यजावलि में जाकर ठहर गया बैठ गया ॥३८॥ 
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*ब्राह्मण को दी पछाड़*
लारें आयो मित्तरु ब्राह्मण, चले गयंद ताहू के सांम्हन । 
ता ब्रांम्हन को दई पछारा, दल बल पहुंच्यो ताही बारा ॥३९॥ 
राजा के पीछे मितरू ब्राह्मण उस स्थान पर पहुंचा वे दोनों हाथी उसके सामने चले और उन्होंने उस ब्राह्मण को पकड कर पछाड़ लगा दी, उसी समय पीछे रहे सभी नौकरों और सैनिकों का दलबल वहां पहुंचा ॥३९॥
(क्रमशः)

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