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*दादू जे जन बेधे प्रीति सौं, सो जन सदा सजीव ।*
*उलट समाने आप में, अंतर नांही पीव ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*भक्त भक्ति भगवंत गुरु, ये मम मस्तक मौर ।*
*राघव इनसे विमुख ह्वै, तिन को कत हु न ठौर ॥१०॥*
भक्त, भक्ति, भगवान् और गुरु ये चारों ही मेरे शिर के मुकुट रूप हैं । इनसे जो मुख मोड़ते हैं, उनको इस विश्व में कहीं भी शांति प्रदाता स्थान नहीं मिल सकता । उक्त चारों के सन्मुख रहने से ही शांति मिलती है ।
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*भक्त भक्ति भगवंत गुरु, ये उर मध्य उपास ।*
*राघव रीझे राम जी, जाहि विघ्न कर्म नास ॥११॥*
भक्त, भक्ति, भगवान् और गुरु इन चारों की सम भाव से हृदय में उपासना की जाती है, तब रोम-रोम में रमने वाले राम जी प्रसन्न होते हैं और मोक्ष प्राप्ति में विघ्नरूप सर्व कर्म नष्ट हो जाते हैं ।
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*भक्त बड़े भगवंत सम, हरि हरिजन१ नहिं भेद ।*
*अरसपरस२ जन३ जगत-गुरु, राघव बरणत वेद ॥१२॥*
भक्त भगवान् के समान बड़े हैं, हरि और हरि-भक्तों१ में भेव लेश मात्र भी नहीं है । भक्त३ और जगत गुरु परब्रह्म आपस२ में मिले हुये ही हैं । इस सिद्धांत का वर्णन वेद भी करता है- “ब्रह्म वेत्ता ब्रह्मरूप ही होता है” इस अर्थ की प्रतिपादक श्रुति प्रसिद्ध है ।
(क्रमशः)

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