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*दादू दिन दिन राता राम सौं, दिन दिन अधिक स्नेह ।*
*दिन दिन पीवै रामरस, दिन दिन दर्पण देह ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ विचार का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*सतसंग-प्रभाव*
*पौधि भगति विघन्न स१ बाकर२,*
*भीति विचार सु बाड़ लगाई ।*
*साधु समागम पाय वहै जल,*
*प्रौढ भयो अति डार बधाई ॥*
*थांवल संत हृदो विसतीरन,*
*जीव जिये दुख ताप नशाई ।*
*छेरनि को डर जाहि हुतो बहू,*
*जोर बढ्यो मत गैंद झुलाई ॥६॥*
आरंभ में उत्पन्न भक्ति की रक्षा विचार से और वृद्धि सत्संग से होती है । वही बात वृक्ष के रूपक से बता रहे हैं- भक्ति रूप पौध को बकरी२ सहित१ अन्य पशुओं के खाने रूप विघ्न का भय३ रहता है, उसकी निवृत्ति के लिये विचार रूप सुन्दर बाड़ लगाई जाती है । सत्संग रूप जल सींचने से वह भक्ति रूप वृक्ष बड़ा हो जाता है फिर भक्त भावरूप बहुत शाखायें आ जाने से विस्तार को प्राप्त हो जाता है तथा संतों के हृदय रूप विशाल थांवले में लगा रहने से सूखता नहीं है । इस भक्ति रूप वृक्ष की प्रवचन रूप छाया में स्थित रहने से अर्थात भक्ति को धारण करने से नाना दुःख और त्रिताप को नष्ट करके जीव भगवत् प्राप्ति रूप नित्य जीवन को प्राप्त हो जाते हैं । प्रथमावस्था में जिस भक्ति रूप पौध को बकरी आदि छोटे पशुओं का भी भय रहता था उसका अब इस अन्तावस्था में इतना बल बढ़ गया है कि काम रूप मतवाला हाथी४ भी उसके झूल सकता है अर्थात् कामरूप हाथी से भी उसको भय नहीं रहता । कारण भक्ति की अन्तिम अवस्था निष्काम ही होती है ।
(क्रमशः)

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