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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग विलावल २१(गायन समय प्रातः ६ से ९)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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३५१ - त्रिताल
आज प्रभात मिले हरि लाल ।
दिल की व्यथा पीड़ सब भागी,
मिट्यो जीव को साल१ ॥टेक॥
देखत नैन सँतोष भयो है,
इहै तुम्हारो ख्याल ॥१॥
दादू जन सौं हिल-मिल रहिबो,
तुम हो दीनदयाल ॥२॥
आज प्रात:काल ही प्रियतम हरि मिल गये,
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अब हमारे मन की वियोग जन्य सभी व्यथा दूर हो गई । जीवात्मा का जन्मादि दु:ख१ मिट गया ।
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उनके दर्शन करते ही नेत्रों को सँतोष हो गया । हे प्रभो ! अब तो इस हृदय में आप का ही ध्यान रहेगा ।
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आप तो दीन दयालु हैं आप को मुझ भक्त से घनिष्ठ सम्बन्ध रख कर ही रहना चाहिये ।
(क्रमशः)

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