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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“तृतीयोल्लास” १६/१८)*
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जोगी, जंगम, बोध सन्यासी,
षट, दरसन, वैरागी उदासी ।
सिंधु कै पारि न उतरै सोई,
सावधान रहै सब कोई ॥१६॥
जोगी, जंगम, बोध सन्यासी, षट, दर्शन के नाथ आदि वैरागी एवं उदासी इन साधुओं में से कोई भी समुद्र के पार न उतरने पावे इसके लिये रक्षकों को सावधान कर दिया एवं कठोर आदेश दे दिया ॥१६॥
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संत जु पहुंचे समंद के पासा,
गैबी आई मिल्यो हरिदासा ।
गैवी सुनो संत, तुम कहां सिधाये,
कहो वचन सो हमहिं सुनाए ॥१७॥
जब संत समुद्र के तट पर पहुंचे तो उसी समय गैव में अंतर हृदय में अन्तर्यामी दर्शन दिये आप मिले और कहा संतों सुनो आप कहां पधार रहे हैं यह बात हमें सुनाकर कहो ॥१७॥
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माणिक दास जन बोले ज्ञांनां,
देस केदार को कियो पयाना ।
गैबी कीजै सैल यह सूत हमारी,
टापू मांही समंद के पारी ॥१८॥
माणकदास व ज्ञान दास ने नम्रता से कहा कि हमने केदार देश जाने के लिये प्रस्थान किया है तब गैवी हरिदास जी ने कहा कि यह हमारी सूत(राय) गुप्त होकर समुद्र के पार जाये अरण्य में बीच में किसी को भी पता न चलेगा ॥१८॥
(क्रमशः)

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