शनिवार, 29 अगस्त 2020

*५. परचा कौ अंग ~ ३३७/४०*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*५. परचा कौ अंग ~ ३३७/४०*
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रांम रांम मांहि बोझ सिर, गुण का आवै नांहि ।
कहि जगजीवन सबद हरि, अबिगत चीन्हा८ मांहि ॥३३७॥
(८ चीन्हा - साक्षात्कार किया)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु की महत्ता के बिना स्मरण भी भार स्वरूप है । वह लाभदायक नहीं है । सच्चा शब्द वह ही है जिसमें प्रभु दर्शन हो ।
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जगजीवन आपा नहीं, रस मैं रह्या समाइ ।
परम पुरीष थैं दूसरा, किहि अंग कहिये ताहि ॥३३८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कोइ अहम ना हो प्रभु प्रेम रस में ही मगन हो उन परम प्रभु के अलावा अन्य कोइ हो ही नहीं तो अन्य किसे कहेंगे सर्वत्र व्यापक है प्रभु ।
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सुन्नि सिनान सदा करै, गंग१ जमुन२ के मधि ।
कहि जगजीवन पवित्तर, हरि चरणों चित बांधि ॥३३९॥
{१. गंग - गंगा(इडा नाडी)} {२. जमुन-यमुना(पिंगला नाडी)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि शून्य में सदा जो सराबोर हो वह इड़ा पिंगला नाड़ियों की जागृत अवस्था है वह ही जीव पवित्र है और प्रभु चरणों से जुड़ा है ।
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तेज पुंज मंहि तेज तन, देह बिदेह निवास ।
कहि जगजीवन जोति मंहि, अबिगत जोति प्रकास ॥३४०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि तेज पुंज में तेजोमय विराजते हैं देह में विदेह प्रभु की कृपा है । संत कहते हैं कि ज्योत में न जाने जान सकने वाले प्रभु का ज्योति प्रकाश है ।
(क्रमशः)

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