🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
🌷🙏🇮🇳 *#भक्तमाल* 🇮🇳🙏🌷
*प्रेम कथा हरि की कहै, करै भक्ति ल्यौ लाइ ।*
*पीवै पिलावै राम रस, सो जन मिलियो आइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*हरि गुरु आज्ञा पाय के, उद्यम१ कीन्हों येह ।*
*जन२ राघव राम हिं रुचे, संतन को यश प्रेह३ ॥१३॥*
हरि की हृदय में प्रेरणा रूप आज्ञा और गुरुदेव की वचन रूप आज्ञा प्राप्त करके यह भक्तमाल लिखना रूप उद्योग१ मैंने आरंभ किया है । राघवदास२ कहते हैं-यह कार्य राम जी को भी रुचिकर होगा । कारण-संतों का यश राम जी को प्यारा३ होता ही है । भक्तमाल में वही होगा ।
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*भक्तमाल भगवंत को, प्यारी लगे प्रत्यक्ष ।*
*राघव सो रट रात दिन, गुरु न बताई लक्ष ॥१४॥*
यह तो प्रत्यक्ष ही है- भक्तमाल भगवान् को प्यारी लगती है और जो भगवान् को प्रिय हो, वही रात दिन रटना चाहिये तथा गुरुजनों ने भी जीव के परम सुख रूप लक्ष को प्राप्त करने की यही बात बताई है ।
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*समुद्र समाय न पेट में, को शिर धरै सुमेर ।*
*ऐसो वक्ता कौन है, अनुक्रम बरणे लेर ॥१५॥*
समुद्र पेट में नहीं समा सकता, सुमेरु पर्वत को शिर पर कौन धारण कर सकता है? वैसे ही ऐसा वक्ता कौन है? जो अनुक्रम का आश्रय लेकर भक्तों का वर्णन कर सके । काल ज्ञान नहीं होने से उक्त दोनों दृष्टान्तों के समान ही अनुक्रम से भक्तों का वर्णन करना भी असंभव ही है ।
(क्रमशः)

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