गुरुवार, 20 अगस्त 2020

= *वक्त ब्यौरा का अंग १२२(१७/२०)* =

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*ज्यों रचिया त्यों होइगा, काहे को सिर लेह ।*
*साहिब ऊपरि राखिये, देख तमाशा येह ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*वक्त ब्यौरा का अंग १२२*
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रचना बिन नांही रती, वक्तों घटि न विराट ।
रज्जब पावैं प्राणी सों, ठाकुर ठया१ जु ठाट२ ॥१७॥
ईश्वर की रचना बिना एक रती भी सृष्टि नहीं हो सकती और इसकी विनाश रूप रचना के बिना यह विराट रूप संसार घटता भी नहीं । अत: प्राणी को समय पर वही मिलता है जो प्रभु ने बनाकर२ स्थिर१ किया है ।
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भगवंत भाग्य मांहिं लिख्या, सोई मिलसी आय ।
ता१ ऊपरि२ ओछा३ अधिक, रज्जब लिया न जाय ॥१८॥
भगवान ने जो भाग्य में लिखा है, वही आ मिलेगा उसकी१ आज्ञा के उपरान्त२ अर्थात बिना आज्ञा अधिक वा कम३ नहीं लिया जा सकता ।
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रती सहित राजेन्द्र व्है, रती विहूणा रंक ।
रज्जब भाग अभाग बिच, एक रती का बंक ॥१९॥
प्रारब्ध रूप रती से युक्त महान् राजा होता है और प्रारब्ध रहित कंगाल होता है, भाग्य और दुर्भाग्य के मधे में जो वक्रता है, वह एक प्रारब्ध की ही है ।
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रज्जब रूठे१ तूठे२ किसी के, घटै बधै कछु नांहि ।
राम रच्या सो होयगा, लिखा जु मस्तक माँहिं ॥२०॥
किसी को रुष्ट१ और संतुष्ट२ होने से घटता बढ़ता कुछ नहीं है । जो राम ने रचकर मस्तक में लिख दिया है, वही होगा ।
(क्रमशः)

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