🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ १६. मध्य का अंग)
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*॥ पंथा पंथी ॥*
*पंथ चलैं ते प्राणिया, तेता कुल व्यवहार ।*
*निर्पख साधु सो सही, जिनके एक अधार ॥६९॥*
जो सम्प्रदायवादी हैं, वे अपने-अपने सम्प्रदाय के अनुसार ही सब व्यवहार करते हैं, उनका संग नहीं करना चाहिये क्योंकि सम्प्रदाय के पक्ष के कारण उचित बात को भी नहीं सुनते और जो निष्पक्ष होकर प्रभु को भजते हैं, वे ही सच्चे साधु हैं । वाद-विवाद में उलझने से हरिभक्ति नहीं हो सकती । अतः सच्चे साधु वाद-विवाद से दूर रहते हैं ।
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*दादू पंथों पड़ गये, बपुरे बारह बाट ।*
*इनके संग न जाइये, उलटा अविगत घाट ॥७०॥*
जो विचारहीन मनुष्य हैं, वे पन्थविशेष से ग्रस्त होने के कारण दुराग्रही होते हैं और वे भक्तिमार्ग से भ्रष्ट हो जाते हैं । उनका संग सर्वदा अनुचित है । क्योंकि भक्तिमार्ग में वेशभूषा या विशिष्ट पन्थ की कोई आवश्यकता नहीं । किन्तु पंथवादियों से निर्विकल्प समाधि का मार्ग भिन्न ही है । पन्थाई तो बारह बाटों से ग्रस्त रहते हैं । वे बारह बाट कौन से हैं-
मोह, दीनता, भय, ह्लास, हानि, ग्लानि, क्षुधा, तृष्णा, मृत्यु, क्षोभ, वृथा, कीर्ति ये बारह बाट कहलाते हैं । अर्थात् ऐसे लोगों के अलग अलग रास्ते हो जाते हैं ।
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*॥ आशय विश्राम ॥*
*दादू जागे को आया कहैं, सूते को कहैं जाइ ।*
*आवन जाना झूठ है, जहाँ का तहाँ समाइ ॥७१॥*
जिसको ज्ञान विवेक पैदा हो गया और जो संयमी स्थितप्रज्ञ हैं, वह अविद्या से जागा हुआ कहलाता है, क्योंकि वह प्राकृत लोकमार्ग को त्यागकर ब्रह्म को जानने के लिये यत्न करता है । वही नर कृतकृत्य और धन्य माना जाता है । जो अविद्या निद्रा में सो रहा है, उसका जीवन व्यर्थ ही है क्योंकि वह सदा माया से मोहित रहता है । वह मोहवशात् माने हुए सुख दुःख को सत्य मानता है । दिवान्धपुरुष को प्रत्यक्ष दिन में भी अन्धेरा दिखता है, क्या वह सत्य हो सकता है ? नहीं ।
जो सोकर जाग गया(जाग आया) उसको अज्ञानी आया हुआ कहते हैं और सोये हुए पुरुष को(सो गया) गया हुआ कहते हैं । वास्तविक दृष्टि से देखा जय तो आत्मा का कहीं आना जाना बनता ही नहीं । जैसे आकाश कहीं आता जाता नहीं । अतः आत्मा में आने जाने का व्यवहार भ्रान्तिमूलक है । ऐसा निश्चय करो ।
इति मध्य के अंग का प. आत्मारामस्वामिकृत भाषानुवाद समाप्त ॥१६॥
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*॥ अथ सारग्राही का अंग १७ ॥*
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*दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।*
*वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥१॥*
(क्रमशः)

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