शुक्रवार, 28 अगस्त 2020

= *वक्त ब्यौरा का अंग १२२(४१/४४)* =

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*समर्थ सिरजनहार है, जे कुछ करै सो होइ ।*
*दादू सेवक राख ले, काल न लागै कोइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*वक्त ब्यौरा का अंग १२२*
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रज्जब निष्फल जाय१ जग, सफल सु दाड्यों२ दाख ।
दोन्यों को दत३ दई४ का, लोग कहो कोउ लाख ॥४१॥
चमेली१ को फल रहित, अनार२ और दाख को फल सहित बनाना दोनों को ईश्वर४ का ही दान३, चाहे लोग लाखों बाते क्यों न कहै, जो ईश्वर ने रच दिया वही रहेगा ।
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देखहु शिर धर कटि पगहुं, अंतरि१ अंतर२ जोय३ ।
जन रज्जब सब ठौर की, बागहुं४ विगति५ सु होय ॥४२॥
देखो, शिर धड़ और पैर इनमें१ भेद२ देखा३ ही जाता है, शरीर के सभी स्थानों की वस्त्रों४ के द्वारा भी विशेष चेष्टा५ होती है ।
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भाग्य भलाई ऊपजै, भाग्य बुराई भंग१ ।
उभय अंग२ आतम लहैं, जे हरि देहि उमंग ॥४३॥
भाग्य से ही भलाई उत्पन्न होती है, भाग्य से ही बुराई नष्ट१ होती है । यदि हरि हर्ष की उमंग से दें तो ही प्राणी को भलाई उत्पन्न होने के और बुराई नष्ट करने के लक्षण२ प्राप्त होते हैं ।
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भाग्य भले गुरु ज्ञान पाइये, भाग्य भले सत संगा ।
भाग्य भले सौं भक्ति उपजै, भेटै अविगत१ अंगा२ ॥४४॥
अच्छे भाग्य से ही गुरु ज्ञान प्राप्त होता है, अच्छे भाग्य से ही सत्संग मिलता है, अच्छे भाग्य से ही हृदय में भक्ति उत्पन्न होती है और अच्छे भाग्य से प्रिय१ प्रभु२ मिलते हैं ।
(क्रमशः)

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