🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग सूहा २२(गायन समय दिन ९ से १२)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
**काया बेली ग्रन्थ**
.
३५८ - रँग ताल
काया मांहीं सागर सात,
काया मांहीं अविगत नाथ ।
काया मांहीं नदिया नीर,
काया मांहीं गहर गँभीर ॥१॥
काया मांहीं सरवर पाणी,
काया मांहीं बसै विनाणी१ ।
काया मांहीं नीर निवान२,
काया मांहीं हँस सुजान ॥२॥
काया मांहीं गँग तरँग,
काया मांहीं जमुना संग ।
काया मांहीं है सुरसती,
काया मांहीं द्वारावती ॥३॥
काया मांहीं काशी स्थान,
काया मांहीं करै स्नान ।
काया मांहीं पूजा पाती,
काया मांहीं तीरथ जाती ॥४॥
काया मांहीं मुनियर मेला,
काया मांहीं आप अकेला ।
काया मांहीं जपिये जाप,
काया मांहीं आपै आप ॥५॥
काया नगर निधान है,
मांहीं कौतिक होइ ।
दादू सतगुरु संग ले,
भूल पड़ै जनि कोइ ॥६॥
.
**= काया मांहीं सागर सात =**
जैसे ब्रह्माँड के ७ द्वीपों के ७ सागर हैं वैसे ही शरीर में सप्त सागर हैं । ब्रह्माँड में द्वीप और सागर इस प्रकार हैं १-जम्बूद्वीप में क्षार समुद्र, २-प्लक्ष में ईक्षुरस समुद्र, ३-कुश में क्षीर सागर, ४-शाल्मलि में सुरा सागर, ५-क्रौंच में दधि सागर, ६-शाक में घृत सागर, ७-पुष्कर में सुधा सागर है, वैसे ही शरीर में १-श्रवण, २-नेत्र, ३-नासिका, ४-मुख, ५-हस्त, ६-उदर, ७-पद, इन सप्त द्वीपों में उक्त सप्त समुद्र हैं वो रस, रक्त, माँस, मेद, मज्जा, अस्थि, वीर्य, ये सात धातु ही सप्त समुद्र हैं ।
.
**= काया माँहीं अविगत नाथ =**
ब्रह्माँड में जैसे इन्द्रियों का अविषय ब्रह्म है वैसे ही काया में कूटस्थ चेतन स्थित है ।
.
**= काया माँहीं नदियाँ नीर, काया माँहीं गहर गँभीर =**
जैसे ब्रह्माँड में अथाह नीर वाहनी नदी हैं, वैसे ही शरीर में रस, उदक, रक्त, शुक्र वाहिनी नाड़ियाँ ही गँभीर नदियां हैं वो मनोरथ जल से परिपूर्ण आशा - नदी है वो राम जल से युक्त नवधा भक्ति ही नदियां हैं ।
.
**= काया माँहीं सरवर पाणी =**
ब्रह्माँड में जैसे विशुद्ध जल युक्त मानसरोवर है, वैसे ही काया में प्रेम - जल परिपूर्ण हृदय - सरोवर है ।
.
**= काया माँहीं बसे बिनाणी =**
ब्रह्माँड में जैसे विशेष ज्ञान युक्त व्यक्ति बसता है, वैसे ही काया में विशेष - ज्ञान - युक्त - बुद्धि१ बसती है ।
.
**= काया माँहीं नीर निवान =**
शरीर में निर्मल ज्ञान - जल का निरभिमान रूप तालाब२ है ।
.
**= काया माँहीं हँस सुजान =**
उस तालाब पर ज्ञानी सँतों का मन - हँस रहता है । वो सहज स्वरूप ब्रह्म सरोवर पर ज्ञानी - सँत - हँस रहता है ।
.
**= काया माँहीं गँग तरँग =**
पिंगला नाड़ी रूप गँगा की श्वास गति रूप तरँग काया में है ।
.
**= काया माँहीं जमुना संग =**
इड़ा नाड़ी रूप यमुना का पिंगला से मूल काया में होता है ।
.
**= काया माँहीं सरस्वती =**
सुषुम्ना नाड़ी रूप सरस्वती काया में है ।
.
**= काया माँही द्वारावती =**
जैसे ब्रह्माँड में द्वारिकापुरी है, वैसे ही काया में सहस्रार चक्र द्वारिका है ।
.
**= काया माँही काशी थान =**
जैसे सँसार में काशी है वैसे ही काया में आत्मा ही काशी है ।
.
**= काया माँहीं करे सनान =**
काया में आत्म चिन्तन रूप स्नान सँत जन करते हैं ।
.
**= काया माँहीं पूजा पाती =**
जैसे बाह्य पूजा होती है, वैसे ही काया में मानस पूजा होती है । बाहर पूजा के समय तुलसी पत्र चढ़ाते हैं, वैसे ही मानस पूजा में प्रेम रूप तुलसी पत्र चढ़ाया जाता है ।
.
**= काया माँहीं तीरथ जाती =**
जैसे जनता तीर्थों में जाती है, वैसे ही काया में वृत्ति तीर्थों में जाती है । जैसे भारत में केदार, गँगासागर, गया, प्रयाग और काशी पँच तीर्थ प्रधान हैं वैसे ही काया में शिर - केदार, कंठ - गया, नाभि - प्रयाग, उपस्थ - गँगा सागर, और चेतन ही काशी है ।
.
**= काया माँहीं मुनियर मेला =**
जैसे बाह्य मुनिवरों का सम्मेलन होता है, वैसे ही मननशील मन इन्द्रियों का एकाग्रता रूप सम्मेलन शरीर में होता है ।
.
**= काया माँहीं आप अकेला =**
जैसे ब्रह्माँड में ब्रह्म सब में रह कर भी सबसे अलग ही रहता है वैसे ही शरीर में भी जीव चेतन सब से अलग अकेला ही रहता है ।
.
**= काया माँहीं जपिये जाप =**
काया में अजपा जाप निरँतर जपा ही जाता है ।
.
**= काया माँहीं आपै आप =**
जैसे ब्रह्माँड में ब्रह्म है वैसे ही काया में भी आत्म रूप से स्वयँ आप ही स्थित है ।
.
**= काया नगर निधान है =**
जैसे ब्रह्माँड में नाना निधियाँ हैं, वैसे ही काया नगर में दया, धर्म, क्षमा, सँतोष, शील, प्रेम, ज्ञानादि निधियों का कोश है ।
.
**= माँहीं कौतिक होइ =**
जैसे ब्रह्माँड में नाना खेल होते हैं वैसे ही काया में भी नाना वृत्ति व्यापार और वृत्ति स्थैर्य रूप खेल होते ही रहते हैं । वो भगवत् प्राप्ति रूप अद्भुत खेल होता है ।
.
**= दादू सद्गुरु संग ले, भूल पड़े जनि कोइ =**
साधक सद्गुरु के सत्संग द्वारा आन्तर साधना से उस प्रभु को ही प्राप्त करे, भ्रम वश उसे भूलकर बाह्य तीर्थादि भ्रमण में ही कोई न पड़े ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें