रविवार, 30 अगस्त 2020

= *वक्त ब्यौरा का अंग १२२(४५/४८)* =

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*दादू स्वर्ग भुवन पाताल मधि, आदि अंत सब सृष्ट ।*
*सिरज सबन को देत है, सोई हमारा इष्ट ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*वक्त ब्यौरा का अंग १२२*
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वक्त१ विभूति२ सु पाइये, भाग्य मिलै भगवंत ।
उभय अभाग्य न आव ही, शोधि३ कह्या सब संत ॥४५॥
समय१ पर भाग्य से ही सम्पति२ प्राप्त होती है, भाग्य से ही भगवान मिलते हैं, सम्पति और भगवान दोनों ही अभाग्य से नहीं आते अर्थात अभागा को नहीं मिलते । यह सभी संतों ने विचार३ करके कहा है ।
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रज्जब सुखी सभागिये१, दुख दीरध सु अभाग२ ।
कहीं ठौर जाइगह३ कहीं, सुख दुख दोन्यों लाग ॥४६॥
भाग्यशाली१ ही सुखी होता है, दुर्भाग्य२ को बड़ा दु:ख रहता है, किसी भी स्थान में जाय भाग्यशाली को सुख मिलेगा और किसी भी जगह३ जाय दुर्भाग्य को दु:ख ही मिलेगा । दोनों के दोनों साथ ही लगे रहते हैं ।
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आकाश मध्य आभा१ अनन्त, जगत धोम२ तहँ जांहिं ।
रज्जब पूरे पूरिय हिं, नर निरखो क्यों नाँहिं ॥४७॥
आकाश में अनन्त बादल१ हैं, उनको भी जगत् की धुँआ२ प्राप्त होती है, वैसे ही भगवान् सब का भरण पोषण कर रहे हैं और करेंगे । हे नरों ! ईश्वर की समयानुसार पोषण नीति को तुम क्यों नहीं देखते हो ?
नदीनाथ१ आवहि नदी, बहु बर्षा तहँ वारि ।
जन रज्जब भरिये भरे, नर निरखों सु२ निहारि३ ॥४८॥
समुद्र१ में नदियाँ आती है, और वहाँ नदियों में बहुत वर्षा होकर जल जाता है, वैसे ही कर्म और समयानुसार भगवान ने प्राणियों का भरण पोषण किया है और कर रहे है । हे नरों ! सम्यक्२ विचार३ द्वारा देखोगे तो भगवान की पोषण निति का तुम्हे ज्ञान होगा ।
(क्रमशः)

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