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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*५. परचा कौ अंग ~ ३४९/५२*
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तेज पुंज महि तेज तन, अंबु हि कुंभ बिलाइ ।
कहि जगजीवन ब्रह्मगति, ब्रह्म१ चरण पद पाइ१ ॥३४९॥
(१. ब्रह्म चरण पद पाइ-ब्रह्म तत्त्व का साक्षात्कार कर लेने पर)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि तेज पुंज में ही तेजोमय विराजते हैं जैसे नदी से भरे घट में भी नदी का जल ही होता है । वह अलग नहीं है । जो ब्रह्म साक्षात्कार कर लेता है वह ब्रह्म गति को ही प्राप्त होता है ।
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तेज पुंज निरसंधि२ हरि, हरि मंहि रहे न संधि३ ।
कहि जगजीवन रांम रटि, रांम तहां मन बंधि ॥३५०॥
{२. निरसंधि - सन्धिरहित(=अभिन्न)} (३. संधि - संयोग)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि तेज पुंज अभिन्न है उसमें व जीव में कोइ भेद नहीं है । जैसे परमात्मा सभी में है किसी से अभेद नहीं है । संत कहते हैं कि हे मन राम भजन कर वहां ही मन स्थिर कर । वही कल्याणकारी है ।
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परम पुरिष हरि जे बरै, ते दुल्हनि सुख पाइ ।
कहि जगजीवन रांम रस, पिव मिलि पावै भाइ ॥३५१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो जीवात्मा परम पुरुष परमात्मा का वरण करती है वही सुखी रहती है । उसे सदैव अपने स्वामी द्वारा राम नाम रस मिलता रहता है व प्रभु सानिध्य भी मिलता है ।
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रवि मंहि रूप अगाध हरि, ससि मंहि सोभा रांम ।
कहि जगजीवन गगन मंहि, परम पुरिष सब ठांम ॥३५२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सूर्य में रुप है चन्द्र में शोभा संत कहते इस प्रकार रुप व शोभा के रुप में सम्पूर्ण गगन में परमात्मा विराजते हैं ।
(क्रमशः)

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