🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
(#श्रीदादूवाणी ~ विचार का अंग १८/२१)
.
*मोटी माया तज गये, सूक्ष्म लिये जाइ ।*
*दादू को छूटै नहीं, माया बड़ी बलाइ ॥१८॥*
स्त्री, पुत्र घर आदि को त्यागने वाले साधु वेशधारी लोग बहुत हैं, किन्तु उन्होंने सूक्ष्म वासना, मान, मद आदि दोषों को नहीं त्यागा । केवल स्त्रीपुत्रादिक के त्यागने मात्र से वासना का त्याग नहीं होता, क्योंकि उसका त्याग बड़ा ही कठिन हैं ।
योगवासिष्ठ में लिखा है कि- “यह संसार का राग अतिविषम है, सांप की तरह प्राणियों को डसता है, तलवार की तरह हृदय के टुकड़े-टुकड़े कर देता है, भाले की तरह हृदय को पीड़ा देता है, रस्सी की तरह जीव को बांध देता है । अनर्थ की शंका के बिना ही मोह के कारण विषयों में पड़े हुए मनुष्यों को पत्थर की तरह जड़ीभूत कर देता है, बुद्धि को हर लेता है, मर्यादा को नष्ट करके पुरुषों को मोहरूपी कूप में डाल देता है ।
यह तृष्णा भी मनुष्य को जर्जर बना देती है । यह विषयविषूचिका(हैजा) का भयंकर रोग है । यदि इसकी चिकित्सा नहीं कराई गयी तो यह मलमुत्रादिकों का नगर जो यह शरीर है, उससे सम्बन्ध रखने वाले पोष्यवर्ग के समूह से अनुराग कराकर पुरुष को बांध देता है । ऐसा कोई दुःख नहीं, जो संसारी पुरुषों को राग के कारण न भोगना पड़े ।”
.
*दादू सूक्ष्म मांहिले, तिनका कीजे त्याग ।*
*सब तज राता राम सौं, दादू यहु वैराग ॥१९॥*
अहंकार, वासना, प्रतिष्ठा, इच्छा, रागद्वेष, विषयभोग, मान-अपमान ये सब अन्तःकरण के सूक्ष्म धर्म है । इनका त्याग ही वास्तविक वैराग्य है । इन सबको त्यागकर ही भजन करना चाहिये ।
गीता में- “हे अर्जुन ! जिस समय यह मनुष्य मन में स्थित संपूर्ण कामनाओं को त्याग देता है और अपनी आत्मा में अपने आत्मा से संतुष्ट रहता है, उस समय यह स्थितप्रज्ञ कहलाता है ।”
दुःखों के आने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं तथा सुखों की प्राप्ति में निःस्पृह रहे, तथा जिसके राग, भय, क्रोध नष्ट हो गये हैं, वह स्थिर बुद्धिवाला है ।
जो पुरुष सर्वत्र, स्नेहरहित है, शुभ अशुभ की प्राप्ति में राग तथा द्वेष नहीं करता, उसकी बुद्धि स्थिर है ।”
योगवासिष्ठ में- “हे ब्रह्मण ! संपूर्ण कामनाओं का त्याग ही उत्तम है और इसी को मोक्ष कहते हैं । वासना के नष्ट हो जाने पर वासना का पुंजचित्त भी गल जाता है । जैसे शीत के समाप्त हो जाने पर हिमकण अपने आप ही गल जाते हैं ।”
.
*गुणातीत सो दर्शनी, आपा धरै उठाइ ।*
*दादू निर्गुण राम गहि, डोरी लागा जाइ ॥२०॥*
जो साधक विवेक वैराग्यादि साधनों से अन्तःकरण के अहंकार आदि धर्मों को त्याग कर निराकार ब्रह्म के ध्यान के अभ्यास से आत्मस्वरूप ब्रह्म को प्राप्त करके गुणातीत स्थिति में पहुँच गया, वह दर्शनीय है ।
वासिष्ठ में लिखा है- “मैं निर्विषय हो गया तथा उन विषयों का मनन करना भी मैंने त्याग दिया, क्योंकि विषयों के मनन करने से उनकी तृष्णा पैदा होती हैं, यह शास्त्रप्रसिद्ध है । जिस मिथ्या अहंकार से मैं तिरस्कृत था, आज उसको भी सर्वथा त्याग दिया । अतः निरीह और भोगों की उत्कण्ठा से रहित हूँ तथा मेरा मन निरिन्धन अग्नि की तरह बिलकुल शान्त हो गया है ।”
.
*पिंड मुक्ति सब को करै, प्राण मुक्ति नहीं होइ ।*
*प्राण मुक्ति सतगुरु करै, दादू विरला कोइ ॥२१॥*
मरने के बाद स्थूलशरीर से मुक्त तो सभी प्राणी होते हैं, किन्तु अपने जीवनकाल में ही प्राणमुक्त(सूक्ष्मशरीर) तो कोई ज्ञानवान् सद्गुरु की कृपा से ही होता है । श्रुति में ज्ञानी के लिये कहा है “ज्ञानवान् के प्राण कहीं आते जाते नहीं, किन्तु यहां ही ब्रह्म में लीन हो जाते हैं ।”
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें