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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्थोल्लास” १३/१५)*
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*बन्दीवानों को जेल से छुड़ाना*
*सुनो राव अब करो खुलासी,*
*जीवत को नहीं दीजे फांसी ।*
*राव कहै यह हमहूं भाई,*
*बंदीवांनां दीन्ह छुडाई ॥१३॥*
हे राजन अब सब बंदियो को खुलासा करो छोड दो । और जो जीवित बचे है उनको फांसी नहीं देना । राजा ने कहा यह बात मेरे को भी अच्छी भली लगती है । सभी बंदियों को मै अभी छुड़ा देता हूं ॥१३॥
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*इतनी सुनी खुशी भये राऊ,*
*आज्ञा पाय रावरे जाऊ ।*
*छरीदार को हुकम जो किया,*
*जेती बंदी छाड़ि सब दिया ॥१४॥*
इतना सुनकर राजा अत्यन्त प्रसन्न हो गया और गुरुकी आज्ञा प्राप्त कर अपने गढ रावले में चला गया । वहां जाकर उसने छडी वाले को हुकुम आज्ञा दी कि जितने कैदी हैं, बंदी है सबको छोड़ दिया जाये ॥१४॥
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*सुनी बात यहु देस मंझारी,*
*करे विनोद सबै नर नारी ।*
*घरि घरि वारि बधावें बाजै,*
*धन्य सब संत धन्य सब आजे ॥१५॥*
यह खबर बात जब सारे देश में सुनी गई तो सब नर नारी प्रसन्नता हर्ष मनाने लगे । प्रत्येक घर के द्वार पर बधाई के बाजे बजने लगे और कहने लगे इस प्रकार परोपकारी सभी संतों को धन्यवाद है और आज हम सभी धन्यवादी है ॥१५॥
(क्रमशः)

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