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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“तृतीयोल्लास” ४९/५१)*
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*निसदिन ध्यान ब्रह्म का*
अह निसि ध्यान ब्रह्म को करई, कहो विप्र सों कैसे मरई ।
ध्यांन कौण देव, सो कहिये, भाख्या ज्ञान भेद तौ लहिये ॥४९॥
हम लोग रात दिन अविचल ब्रह्म का ही ध्यान करते हैं अत: विप्र आप ही बताओ कि हमारी मृत्यु कैसे हो सकती है क्योकि अविनासी का ध्यान करने से साधक भी अविनासी हो जाता है ॥४९॥
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दया धर्म सो ध्यांन बताया, कर्म विवरजित ज्ञान कहाया ।
दूजे ध्यांन ब्रह्म ल्यौ लावे, अगम निगम कहे ज्ञान कहावे ॥५०॥
ज्ञान और माणक दास विप्र को बताते है कि संसार में दयाऔर धर्म का कार्य ही ध्यान होता है और निष्काम भाव एवं फलेच्छा रहित भावना से किया कार्य ही ज्ञान है ऐसा शास्त्रों में कहा है । स्व: कल्याण के लिये परब्रह्म में अपनी सुरति वृति लगाकर एकात्म भाव से ल्यो लगाना ध्यान है ऐसा अगम शास्त्र ज्ञान बताते हैं ॥५०॥
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*राजा और ब्राह्मण चरणो में गिरे*
जो बूझे सो उत्तर होई, विप्र राव को संसै खोई ।
बहुत भांति तिन ज्ञान दिढाया, राई विप्र दोऊ मस्तक नाया ॥५१॥
विप्र एवं राजा ने जो जो प्रश्न संतों से किये उनका उन्होंने ठीक उत्तर दिया इससे राजा और विप्र के सभी प्रकार के संशय भ्रम नष्ट हो गये । अनेक प्रकार से संतों ने उपदेश देकर उनका ज्ञान दृढ किया, और राजा एवं विप्र ने संतों के चरणों में अपना मस्तक झुकाया ॥५१॥
(क्रमशः)

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