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*तहँ दिन दिन अति आनन्द होइ,*
*प्रेम पिलावै आप सोइ ।*
*संगियन सेती रमूं रास,*
*तहँ पूजा अर्चा चरण पास ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. ३६९)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*मनहर-*
*नमो नमो नमो निराकार करतार जपि,*
*विष्णु रु विरंची शिव शेष शीश नाय हूँ ।*
*द्वादश भगत नमो दश षट पारषद,*
*नमो नव नाथ जु चौरासी सिद्ध गाय हूँ ॥*
*देव सर्व ऋषि सर्व निरख नक्षत्र सर्व,*
*जती षट सती सप्त-बीस हु मनाय हूँ ।*
*तत्व के नवीस१ त्रय लोक मध्य जे प्रसिद्ध,*
*रघवा रटत सु प्रत्यक्ष कब पाय हूँ ॥२८॥*
विश्व के कर्ता निराकर परमात्मा का नाम जपते हुये उन्हें मन से भावना रूप से, वाणी से शब्द के उच्चारण द्वारा और शरीर से साष्टांग दंडवत रूप में नमस्कार करके...
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विष्णु, ब्रह्मा, शिव और शेष जी को शिर नमाते हुये प्रणाम करता हूँ । द्वादश भक्तों सोलह पार्षदों, नव नाथों और चौरासी सिद्धों को प्रणाम करके उनका यश गान करता हूँ ।
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सर्व देव, सर्व ऋषि, सर्व नक्षत्र, षट यति, सताईस सती इन सबको पूज्य दृष्टि से देखकर प्रणाम द्वारा मनाता हूं...
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और तीनों लोकों में जो भक्ति ज्ञानादि रूप तत्व ग्रंथों के लेखक१ प्रसिद्ध हैं, उनको भी प्रणाम करते हुये उनके नाम तथा यश को रटता हूं । प्रत्यक्ष रूप में तो उनको कब तक प्राप्त कर सकूंगा, यह तो अभी निश्चय रूप से नहीं कहा जा सकता, इस समय तो स्मरण मात्र से ही संतोष करता हूं ।
(क्रमशः)

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