गुरुवार, 10 सितंबर 2020

*६. जरणां कौ अंग ~ १३/१६*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*६. जरणां कौ अंग ~ १३/१६*
बीरज सकल धरती मिलै, बाहर रती३ न आइ ।
जगजीवन सारै सिरै, कण लागै रस मांहि ॥१३॥
(३. रती - अल्प मात्रा में भी)
संतजगजीवन जी कहते हैं जिस प्रकार सम्पूर्ण बीज धातु धरती में समाकर बिल्कुल भी बाहर नहीं आता । और पूरण परिवर्तित हो कर उसी कण से सारा सब कुछ पनपता है ।
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सौ मण सोनो४ नीगलै५, ससिहर६ के घर सूर ।
जगजीवन पारा भरै, सबद रसायण नूर ॥१४॥
(४. सोनो - सुवर्ण) {५. नीगलै - निगल जाय(खा जाय)} (६. ससिहर - चन्द्रमा)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि चन्द्र की जो शीतलता है वह स्वर्ण सम है जिसे संध्या काल में ऐसा लगता जैसे सूर्य ने निगला हो । तब उससे जो शब्द निकलते हैं वे पारे जैसे वजनी होते हैं । तात्पर्य है कि तप कर भी जो नम्र है वह ही सार्थक है । यह साखी कबीर साहिब की उलट बासी जैसी है ।
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औंड़ी७ बस्तु नकास ले, मांहै पवन उसार ।
जोर कियां८ जे जात है, जगजीवन सो जार ॥१५॥
(७. औंड़ी वस्तु - गहरे में पड़ी हुई वस्तु) {८. जोर कियाँ - जबरदस्ती(बलप्रयोग)} 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि गहरी अर्थ में भी जो भी वस्तु हो उसे पवन के प्रभाव से निकाल लें अर्थात श्वास के प्रभाव से प्रभु समर्पण भाव ग्रहण करें, बल प्रयोग करने पर भी न मिले उसे छोड़ दें ।
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बिन इंद्री भोजन करै, मन भावै सो खाइ ।
अजक९ अजीरण१० आफरा११, जगजीवन नहिं ताहि ॥१६॥
(९. अजक - व्याकुलता) {१०. अजीरण - अजीर्ण(अपच)} {११. आफरा - अफारा(=पेट फूलना)} 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि परमात्मा के नाम की क्षुधा बिना इन्द्रियों के ही तुष्ट होती है और उससे न तो व्याकुलता होती है न ही वह असमाया होता है न ही उससे आफरा आता है । हमें वह बोझिल नहीं लगता है ।
(क्रमशः)

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