गुरुवार, 3 सितंबर 2020

*ब्रह्म क्या है*

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*तन मन विलै यों कीजिये, ज्यों पाणी में लूंण ।*
*जीव ब्रह्म एकै भया, तब दूजा कहिये कूंण ॥*
*तन मन विलै यों कीजिये, ज्यों घृत लागे घाम ।*
*आतम कमल तहँ बंदगी, जहँ दादू प्रकट राम ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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*साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)*
*साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ*
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“ब्रह्म क्या है, यह मुँह से नहीं बताया जा सकता । जिसे उसका ज्ञान होता है वह फिर खबर नहीं दे सकता । लोग कहते हैं कि कालेपानी में जाने पर जहाज फिर नहीं लौटता ।
“चार मित्रों ने घूमते-फिरते हुए ऊँची दीवार से घिरी एक जगह देखी । भीतर क्या है यह देखने के लिए सभी बहुत ललचाये । एक दीवार पर चढ़ गया । झाँककर उसने जो देखा तो दंग रह गया, और ‘हा हा हा हा’ करते हुए भीतर कूद पड़ा । फिर कोई खबर नहीं दी । इस तरह जो चढ़ा वही ‘हा हा हा हा’ करते हुए कूद गया ! फिर खबर कौन दे ?
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“जड़भरत, दत्तात्रेय – ये ब्रह्मदर्शन के बाद फिर खबर नहीं दे सके । ब्रह्मज्ञान के उपरान्त, समाधि होने से फिर ‘अहं’ नहीं रहता । इसीलिए रामप्रसाद ने कहा है, ‘यदि अकेले सम्भव न हो तो मन, रामप्रसाद को साथ ले ।’ मन का लय होना चाहिए, फिर ‘रामप्रसाद’ का अर्थात् अहं-तत्त्व का भी, लय होना चाहिए । तब कहीं वह ब्रह्मज्ञान मिल सकता है ।”
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एक भक्त- महाराज, क्या शुकदेव को ज्ञान नहीं हुआ था ?
श्रीरामकृष्ण- कितने कहते हैं कि शुकदेव ने ब्रह्मसमुद्र को देखा और छुआ भर था, उसमें पैठकर गोता नहीं लगाया । इसीलिए लौटकर उतना उपदेश दे सके । कोई कहता है, ब्रह्मज्ञान के बाद वे लौट आए थे – लोकशिक्षा देने के लिए । परीक्षित् को भागवत सुनाना था और कितनी ही लोकशिक्षा देनी थी – इसीलिए ईश्वर ने उनके सम्पूर्ण अहं-तत्त्व का लय नहीं किया । एकमात्र ‘विद्या का अहं’ रख छोड़ा था । 
(क्रमशः)

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