गुरुवार, 3 सितंबर 2020

सारग्राही का अंग २४/२५, विचार का अंग १

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ १७. सारग्राही का अंग/१८. विचार का अंग)
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*॥ उभै असमाव ॥*
*जहँ दिनकर तहँ निशि नहीं, निशि तहँ दिनकर नांहि ।*
*दादू एकै द्वै नहीं, साधुन के मत मांहि ॥२४॥*
जहां सूर्य है, वहां पर रात्रि नहीं और जहां रात्रि है वहां सूर्य नहीं रहता है । वैसे ही जहां अज्ञान है वहां ज्ञान नहीं, और जहां ज्ञान है, वहां अज्ञान नहीं ठहरता, क्योंकि दोनों का विरोध है । इसी तरह जहां अद्वैत ब्रह्म की भक्ति है वहां पर मायाकृत द्वैत ही नहीं रहता अतः सारासार के विवेक को जानने वालों को सदा राम की भक्ति करनी चाहिये । क्योंकि सारे वेदवेदान्तों का यही सार है । 
पद्मपुराण में लिखा है- राम से बढ़कर कोई देवता नहीं और राम ही सब ब्रतों का सार है । राम से बढ़कर कोई योग नहीं, रामनाम से बढ़कर कोई मन्त्र नहीं । अतः उसको याद करके, या पूजा करके, परमपद को मनुष्य प्राप्त कर लेता है तथा ऐहिक और पारलौकिक सिद्धियों को भी प्राप्त कर लेता है । रामनाम के स्मरण व ध्यान से सारी कामनाएँ पूरी हो जाती है तथा संसार से पार करने वाली भक्ति मिल जाती है । यदि चाण्डाल भी रामनाम का स्मरण करता है तो वह परम गति को प्राप्त हो जाता है । फिर वेद शास्त्रों के ज्ञाता यदि पार हो जाए तो इसमें क्या कहना है । इस तरह वेदशास्त्रों का रहस्य आपके सामने प्रकाशित कर दिया । अतः उसका आचरण करो । जिससे तुम्हारी भी कामना पूर्ण हो जाय ।
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*दादू एकै घोड़ै चढ चलै, दूजा कोतिल होइ ।*
*दुहुँ घोड़ों चढ बैसतां, पार न पहुंचा कोइ ॥२५॥*
जैसे कोई एक काल में दो घोड़ों पर बैठकर रास्ता पार नहीं कर सकता । ऐसा करने से वह उपहास का ही पात्र बनता है । एक घोड़े पर बैठकर ही रास्ता पार कर सकता है । यह लोकप्रसिद्ध है । एक घोड़े को साथ लेकर चले तो रास्ता पार करने में कोई बाधा नहीं आती । इसी प्रकार निवृत्ति और प्रवृत्ति ये दो मार्ग हैं । इनमें से निवृत्ति मार्ग को अपनाकर चलने से मोक्ष मिलता है । प्रवृत्ति मार्ग तो केवल व्यवहार के लिए ही है । अतएव कहा है कि निवृत्ति महान् फल को देती है और प्रवृत्ति बन्धन में डालती है । अतः साधक को सारासार का विचार करके निवृत्ति मार्ग को ही अपनाना चाहिए । 
कठोपनिषद् में लिखा है कि- कल्याण का साधन अलग है और प्रिय लगने वाले भोगों का साधन अलग है, भिन्न-भिन्न फल देने वाले ये दोनों साधन मनुष्य को बांधते हैं । अर्थात् अपनी-अपनी ओर खींचते हैं । कल्याण के साधन को ग्रहण वाले का कल्याण होता है । जो सांसारिक उन्नति के मार्ग को स्वीकार करता है वह यथार्थ लाभ से भ्रष्ट हो जाता है । श्रेय और प्रेय दोनों ही मनुष्य के सामने आते हैं । बुद्धिमान् मनुष्य इन दोनों के स्वरूप पर विचार करके उनको अलग-अलग समझ लेता है । श्रेष्ठ बुद्धि वाला मनुष्य कल्याण के साधन को ही श्रेष्ठ समझ कर उसको ही ग्रहण करता है । मन्दबुद्धि मानव तो लौकिक योगक्षेम की इच्छा से भोगों के साधनरूप प्रेय को अपनाता है ।
इति सारग्राही के अंग का पण्डित आत्मारामस्वामिकृत भाषानुवाद समाप्त ॥१७॥
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*अथ विचार का अंग १८*
*दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।*
*वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥१॥*
(क्रमशः)

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