मंगलवार, 8 सितंबर 2020

= *निन्दा का अंग १२३(५/८)* =

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*साधु निर्मल मल नहीं, राम रमै सम भाइ ।*
*दादू अवगुण काढ कर, जीव रसातल जाइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*निन्दा का अंग १२३*
नाम नाज उर१ धर२ बहै, बाहै प्राणि किसान ।
रज्जब रिधि३ दीये बिना, निंदक करे निदान४ ॥५॥
किसान पृथ्वी२ से नाज बोता है, फिर उसके उगने पर पैसे देकर उसका निनाण करता है, वैसे ही हृदय१ में नाम चिंतन किया जाता है फिर उसकी योग्यता बढने पर निंदक बिना धन३ दिये भी निंदा द्वारा उसे दोष दूर४ करता है ।
निंदक हू नूर निस्तरै१, कुमिंत२ सुमिंत३ हूं याद ।
कहीं४ भाँति जाणे न जड़, जन्म जात जो बाद५ ॥६॥
निंदक कुमित्र२ हो या सुमित्र३ दोनों प्रकार के नरों को ही निंदा द्वारा याद करके उसका उद्धार१ करता है । शिक्षा देने पर भी वह मूर्ख निंदा के दोषों को किसी४ भांति भी नहीं जानता, अत: उसके नर जन्म का जो समय जाता है वह व्यर्थ५ ही जाता है ।
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निंदक निंदा निस्तरै, दिल सु दूर व्है दोष ।
महा पुरुष पारस मई, लोहा लगौं रस रोस ॥७॥
पारस पर लोहा की चोट क्रोध से लगती है तो भी वह रस रूप हो जाती है अर्थात लोहा सुवर्ण बन जाता है वैसे ही महापुरुष भी पारस रूप ही है, निंदक उनकी निंदा करता है तब उसके हृदय के दोष दूर होकर उसका उद्धार हो जाता है ।
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निंदा विद्या नरक मधि१, घटि बाधी कहातों व्याधि ।
रज्जब राम न मान ही, लागा रोग असाधि२ ॥८॥
निंदा के द्वारा विद्या भी नरक का मार्ग१ बन जाती है । वास्तविक वात से कम और अधिक महान व्याधि है । जिसके निंदा रूप असाध्य२ रोग लग जाता है, उस विद्वान की विद्या को भी राम श्रेष्ठ नहीं मानते ।
(क्रमशः)

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