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*बाव भरी इस खाल का, झूठा गर्व गुमान ।*
*दादू विनशै देखतां, तिसका क्या अभिमान ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ काल का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु*, *मनुज देह*
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एक बुद्धिमान मनुष्य ने अपने पुत्र को शरीर के अभिमान में झूमझूम कर चलते देखकर कहा - "पुत्र ! क्या तू अपने को जानता है कि तू किस की सन्तान है ? तेरी मां को तो मैंने कुछ रुपयों में मोल लिया था और मैं तेरा पिता भी अति अधम हूँ तथा मेरा शरीर भी मल मूत्रादिक से भरा है । फिर किसके अभिमान से ऐसा चलता है ?"
मल मुत्रादिक रूप तन, इसका क्या अभिमान ।
निज सुत के कहते भये, इमिहि एक मतिमान ॥९५॥

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