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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*६. जरणां कौ अंग ~ ९/१२*
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कहि जगजीवन सब जरै, नख सिख सुंनि समाइ ।
सहज जरैं सो स्वाद लहै, बूंद न बाहरि जाइ ॥९॥
संत जगजीवन कहते हैं कि सब समाया रहे । नख से शिख तक अर्थात सम्पूर्ण शून्य समाहित हो । सहज समाये का जो आनंद लेते हैं वे इसे लेश मात्र भी बाहर व्यर्थ नहीं जाने देते ।
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भंजन के संचै११ भरै, और जरै जरि ताहि ।
भरि धरि जरि हरि मांहि रहै, जगजीवन ल्यौ लाइ ॥१०॥
(११. भंजन के संचै - संचय=पात्रसमूह)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि भजन का संचय भरा रहे । वह समाया भी रहे । भरे व रखे व स्वयं परमात्मा की आज्ञा में ध्यान लगा कर रहे ।
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पवन जरै सो मन जरै, मन तहां इंद्री लार ।
कहि जगजीवन मारि जरि, सहजि पिछांणै सार१ ॥११॥
(१. सार - कठोर द्रव्य)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो मन में समायी है हवा श्वास बन कर इन्द्रियां भी उसी का अनुसरण करती हैं इन सब को मार कर जला कर अर्थात पूर्णतः नष्ट करके ही सार तत्व पाया जाता है ।
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भजै जरै नित नूर हरि, ते गुण मानैं रांम ।
कहि जगजीवन आंन भजि, झरै सूं कूंणैं काम२ ॥१२॥
{२. कूणैं काम - किस काम का(निष्प्रयोजन)}
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जो नव ज्ञान से भरे व फिर छलके नहीं और प्रभु कृपा माने वह ही सार्थक है । संत कहते हैं कि प्रभु को छोड़कर अन्य से आशा नहीं करनी चाहिए यह छलकने जैसी होती है । और इससे कभी कोइ कार्य सिद्ध नहीं होता है ।
(क्रमशः)

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