रविवार, 13 सितंबर 2020

*कालहु से जित्यो जंग*

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*जरै सु नाथ निरंजन बाबा, जरै सु अलख अभेव ।*
*जरै सु जोगी सब की जीवन, जरै सु जग में देव ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ जरणा का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,* 

*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान* 

*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*

*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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अरक१ आहार रु श्रृंगार भसमी को भर२,
ऐसो हर निडर निशंक भोला चक्कवै ।
पूरक पवन प्राण-वायु को निरोध करे,
जपत अजपा हरि हरे थिर थक्कवै४ ॥
गौरी अरधंग संग कियो है अनंग५ भंग,
कालहु से जित्यो जंग पूरा योगी पक्कवै६ ।
राघो कहै जगै न जगत पति सेती७ ध्यान,
अडिग अडोल अति लागी पूरी जक्कवै८ ॥३१॥
जो आकड़े१ आदि का भोजन करते हैं और शरीर पर श्रृंगार रूप में भस्म लगाते२ हैं, किसी से डरते नहीं हैं, ज्ञात ज्ञेय होने से उन्हें कोई शंका नहीं होती है । सरल स्वभाव के हैं, ऐसे होने पर भी भगवान् शंकरजी संसार में चक्रवर्ती३ के समान शोभा पाते हैं । 
प्राण-वायु को पूरक प्राणायाम द्वारा शरीर के भीतर भर के कुंभक प्राणायाम से रोक लेते हैं । इस प्रकार अपने मन को थकाकर४ अजपा-जाप के साथ हरि ध्यान करते हुये स्थिर रहते हैं ...
और जिनने पार्वती का आधा अंग अपने शरीर में ही बनाकर संग करते हुये भी काम५ को नष्ट कर डाला है । काल से भी युद्ध में विजय प्राप्त की है अर्थात् कई एक भक्तों को काल से बचाया है । ऐसे पके६ हुये पूरे योगीराज हैं । 
जगत के स्वामी परब्रह्म के ध्यान में अडिग रहने से७ अति अचल पूर्ण समाधि८ लगी रहती है, इस कारण समाधि से जगते ही नहीं हैं । ऐसे भगवान् शंकर जी को नमस्कार है, वे भक्तमाल रचना रूप कार्य में अवश्य मेरी सहायता करेंगे ।
(क्रमशः)

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