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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग वसँत २३(गायन समय प्रभात ३ से ६ तथा वसँत ॠतु)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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३६८ - **उपदेश** । एक ताल
बहुरि न कीजै कपट काम,
हृदय जपिये राम नाम ॥ टेक ॥
हरि पाखैं१ नहिं कहूँ ठाम,
पीव बिन खड़भड़ गांव गांव ।
तुम राखोल जियरा अपनी मांम२,
अनत जनि जाय रहो विश्राम ॥१॥
कपट काम नहिं कीजै हांम३,
रहु चरण कमल कहु राम नाँम ।
जब अंतरयामी रहे जाँम४,
तब अक्षय पद जन दादू पांम५ ॥२॥
उपदेश कर रहे हैं - फिर कभी भी कपट पूर्ण काम न करना । हृदय में हरि का ध्यान करते हुये राम - नाम जपना चाहिए । हरि बिना१ कहीं भी शाँति का स्थान नहीं है । प्रभु रक्षा न करें तो प्रति ग्राम में गड़बड़ हो सकती है । तुम मन तथा अपनी ममता२ प्रभु में ही रक्खो । अन्य में ममता न जायगी, तब ही सुख से रह सकोगे ।
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कपट - पूर्ण काम के करने की हिम्मत३ न करो । वृत्ति द्वारा भगवद् चरण - कमलों में रहते हुये राम का नाम कहो । जब अन्तर्यामी प्रभु एक पहर४ भी तुम्हारे हृदय में प्रकट होकर रहेंगे तो तुम भक्त बनकर अक्षय पद प्राप्त५ कर लोगे ।
(उक्त भजन द्वारा डाका मारने पर पीथा को कहा था ।)
(क्रमशः)

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