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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*६. जरणां कौ अंग ~ २५/२८*
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कहि जगजीवन रांमजी, अजर जरै अंबु मांहि ।
अनंत किरण ससि सूर मधि, त्रिगुन तिमिर तिंहि जांहि७ ॥२५॥
(७. त्रिगुन तिमिर तिंहि जांहि - सत्त्व, रज, तम - इन तीन गुणों से
युक्त अविद्या रूप अन्धकार नष्ट हो जाता है)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो यौवन युक्त है वह भी जल में समायी रखता है । इसी प्रकार सूर्य चंद्र में अनंत किरण समायी रहती है । जहां त्रिगुण सत्व, रज, तम अज्ञान अंधकार को दूर करते हैं ।
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कहि जगजीवन रांमजी, अजर जरै वपु ब्यंद८ ।
सोई ब्यंदै बसत कूं, जोति पिछांणै ज्यंद९ ॥२६॥
(८. ब्यंद - बिन्दु) {९. ज्यंद-(क) जीवन, (ख) जीव}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो अजर की भी समायी रखता वह देह है । और जो इस ज्ञान की बूंद को जान ले वह ही जीवन है ।
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देह जर जरी१० रांमजी, अजर बस्तु ता मांहि ।
कहि जगजीवन मारि मर, खिरै करै ते नांहि ॥२७॥
{१०. जर जरी - जीर्ण शीर्ण(=टूटी फूटी)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि देह तो जीर्णावस्था को प्राप्त होती है किन्तु उसमें स्थित ज्ञान व आत्मा कभी जीर्ण नहीं होते चाहै जीव मरे या रहे वे अक्षुष्ण रहते हैं ।
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भू पृथ्वी रस बिलसतां, खाली ह्वै ह्वै जाइ ।
कहि जगजीवन रांम रस, पिवै न प्रांण अघाइ ॥२८॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि पृथ्वी पर जितने भी रस है उन्हें तो हम उपभोग से खाली कर सकते है किंतु परमात्मा के नाम का रस कभी भी अरुचिकर नहीं होता उसमें रुचि बनी रहती है ।
(क्रमशः)

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