रविवार, 6 सितंबर 2020

*(“चतुर्थोल्लास” ४/६)*

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
*(“चतुर्थोल्लास” ४/६)*
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*ताहि साहिब का कीजै ध्यान,*
*कर्म विवरजत गहिये ज्ञान ।* 
*मिथ्या त्याग कर गहि ये साच,*
*लेहु खरा सब तजिये काच ॥४॥* 
उस निर्गुण निरंजन ब्रह्म स्वरूप साहिब का ही ध्यान करना एवं कर्म फल से रहित कर्म कर ज्ञान को ग्रहण कीजिये । झूठे सांसारिक पदार्थो का त्याग करके सत्य स्वरुप ब्रह्म को ग्रहण करो । खरा व सच्चा सौदा भक्ति ज्ञान रूप ग्रहण करो और देवी देवताओं की पूजारूप मिथ्या कांच को छोडो ॥४॥ 
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*हृदय में तुम करो विचारु,*
*ज्ञान, ध्यान, निर्णय निरधारु ।* 
*मिथ्या कोंण काच का भेव,*
*खरा साच कहो गुरुदेव ॥५॥* 
हे राजन् हृदय में विचार करके केवल निर्गुण निरंजन ब्रह्म का ही ज्ञान ध्यान करना है यह निर्णय पक्का कर लो । राजा ने कहा मिथ्या कौन है और काच क्या है इसका रहस्य समझावे एवं खरा क्या है और साच क्या है गुरुदेव यह भी समझावे ॥५॥ 
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*ब्रह्म साच माया है मिथ्या,*
*शब्द खरा, प्यंड काच सु कथ्या ।* 
*शब्द विचारे, करणी कीजे,*
*जुरा काल प्यंड का छीजे ॥६॥* 
हे राजन निर्गुण निरंजन ब्रह्म सच्चा व खरा है और यह पिंड रुप शारीरादिक पदार्थ दिखाई देते हैं वे मिथ्या है । शब्द विचार कर कार्य करना सुखदाई है और पिंड रूप शरीर में ही बुढ़ापा मृत्यु आदि का प्रभाव है । ब्रह्म तो एक रस व नित्य है ॥६॥
(क्रमशः)

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