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🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ विचार का अंग ६/९)
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*ईयें रब्ब रूहनि में, जीयें रूह रगनि ।*
*जीयें जेरो सूर मां, ठंडो चन्द्र बसंनि ॥६॥*
जैसे नाडियों में आत्मा(प्राण) सूर्य में प्रकाश, चन्द्रमा में शीतलता है, वैसे ही सब जीवों में ब्रह्म व्यापक होने से विराजमान है । लिखा है कि देह, इन्द्रिय, मन, प्राण, इन सब का साक्षी तथा चित्त को प्रसन्न करने वाला सूक्ष्म आत्मा सारे शरीर में है, लेकिन वह ज्ञानरुपी दर्पण से ही दिखता है ॥
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*दादू जिन यहु दिल मंदिर किया, दिल मंदिर में सोइ ।*
*दिल मांही दिलदार है, और न दूजा कोइ ॥७॥*
जिस परमात्मा ने इस हृदय को मन्दिर बनाया है वह ही परमात्मा इस मन्दिर में साक्षीरूप से रहता है । वह परमात्मा मेरा मित्र है, मैं उसके बिना किसी को भी नहीं जानता हूँ ।
इस साखी में श्रीदादूजी ने साक्षी के स्वरूप को दिखलाया है । कोई शंका करे कि इस जीव के अतिरिक्त और कौन सा साक्षी है जिसका साक्षी से व्यवहार करते हो ? तो उसका उत्तर दे रहे हैं “दिल मन्दिर में सोइ” जो दोनों देहों का अधिष्ठानभूत कूटस्थ चैतन्य अपने अपने अवच्छेदक दोनों देहों को साक्षात् देखने के कारण तथा निर्विकार होने से साक्षी, कहलाता है । लोक में भी देखा जाता है कि जो उदासीन रहता तथा ज्ञान भी सबका रखता है उसको ही साक्षी कहते हैं । अच्छा, दोनों शरीरों का तो मन की वृत्ति से ही ज्ञान हो जायेगा फिर साक्षी की क्या आवश्यकता है ? इसका समाधान यह है कि अन्तकरण में प्रतिबिम्बित कूटस्थ चैतन्य के द्वारा जो ईषत् प्रकाश हो रहा है उस साक्षी प्रकाश से प्रकाशित देहद्वय को अन्तःकरण की वृत्ति में आरूढ चैतन्य प्रकाशित करता है । अन्तःकरण की वृत्ति से सदा देहद्वय का कूटस्थ चैतन्य के प्रकाश के बिना प्रकाश नहीं हो सकता । क्योंकि अन्तःकरण की वृत्ति उस समय नहीं रहती है तब साक्षी ही देहद्वय का प्रकाशक होता है और वृत्ति के अभाव को भी साक्षी ही प्रकाशित करता है । अतः अहंकार आदि का साक्षी से सदा सम्बन्ध रहने से उसके विषय में किसी को सन्देह नहीं होता और अन्य ज्ञान की धारा काल में इतने समय तक मैं देखता ही रहा हूँ, ऐसा अनुसंधान भी साक्षी के मानने से ही सिद्ध हो सकता है ।
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*मीत तुम्हारा तुम्ह कनै, तुम ही लेहु पिछान ।*
*दादू दूर न देखिये, प्रतिबिम्ब ज्यों जान ॥८॥*
इस पद्य में भी साक्षी का स्वरूप ही दिखला रहे हैं । भाव यह है कि ‘मैं रूप को जानता हूँ’ इस वाक्य में दृष्टा दृश्य दर्शन का एक ही यत्न से जो सबको प्रकाशित कर देता है, वह ही साक्षी है । बुद्धि में इस त्रिपुटी को प्रकाशित करने की शक्ति नहीं है, किन्तु निर्विकार ज्ञानस्वरूप स्वप्रकाश चैतन्य स्वरूपसाक्षी से प्रकाशित होकर उसी के प्रकाश से यह बुद्धि ‘घट-पट’ इस प्रकार ज्ञानाकर से परिणित हो जाती है ।
पञ्चदशी के नाटकदीप प्रकरण में लिखा है- ‘नृत्यशाला में स्थित दीपक । वहाँ पर बैठे हुए स्वामी को, सभासदों को अविशेष रूप से(घट बढ़े बिना) सभी को प्रकशित करता है । अर्थात् दीपक चाहे नृत्यशाला में स्वामी हो या अन्य उनके लिये अपने प्रकाश की वृद्धि ब ह्लास नहीं करता, किन्तु सब के लिये उसका प्रकाश सामान्य ही रहता है । ऐसे ही साक्षी अहंकार को, बुद्धि को तथा विषयों को अहंकारादिक के अभाव को भी प्रकाशित करता है । निरन्तर प्रकाशमान्, कूटस्थ चैतन्य, जो ज्ञानस्वरूप है, उसके स्वरूप से बुद्धि स्वयं प्रकाशित होकर घट पट आदि पदार्थों को प्रकाशित करती है । जैसे नर्तकी दीपक के प्रकाश में अनेक प्रकार से नाचती है, जैसे बिम्ब से प्रतिबिम्ब भिन्न नहीं होता, वैसे ही प्रतिबिम्ब रूप जीव भी अपने को साक्षी रूप ही जाने ।”
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*दादू नाल कमल जल ऊपजै, क्यों जुदा जल मांहि ?*
*चंद हि हित चित प्रीतड़ी, यो जल सेती नांहि ॥९॥*
जल से पैदा होने वाली कुमुदिनी जल में न रहकर सदा जल के ऊपर ही रहती है, इसका क्या कारण है ? इसका उत्तर श्रीदादूजी महाराज दे रहे हैं कि उसका जैसा चन्द्रमा से प्रेम है, वैसा जल से नहीं, अतः सदा वह चन्द्रदर्शन के लिये जल के ऊपर तैरती रहती है । वैसे ही वैराग्यवान् पुरुष की भी प्रीति परमात्मा में है, न कि संसार में । अतः वह संसार में रहता हुआ भी संसार से असंग ही रहता है ।
अतः जो जिज्ञासु संसार से पार जाना चाहता है तो उसको दिन रात संसार का विचार करना चाहिये । श्रीशंकारचार्य जी लिखा रहे हैं कि- “तुम कौन हो ? मैं कौन हूँ ? कहाँ से आया हूँ ? कौन मेरे माता पिता हैं ?” इस प्रकार सारे संसार को असत्य मानकर स्वप्न की तरह इसके संग को त्याग दो ।
वासिष्ठ में भी कहा है कि- “मैं कौन हूँ ? यह संसार किसका है ? यह विचार बुद्धिमान् को सदा करते रहना चाहिये, यदि साधक अपने प्रतीकार चाहता है ।”
(क्रमशः)

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