🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
https://www.facebook.com/DADUVANI
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
.
*५. परचा कौ अंग ~ ३६५/६७*
.
सौंपि सरीर रिझाइ हरि, अंग मंहि अंग समाइ ।
कहि जगजीवन जतन करि, निरखि नूर मिलि जाइ ॥३६५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि यह शरीर प्रभु को सौंप कर उन्हें प्रसन्न रखें और उनमें ही समाहित हो जब इस संसार से जाये तो प्रभु शरण ही मिले ।
.
अपणीं अपणीं पीड़ हरि, सब कोइ करै पुकार ।
कहि जगजीवन दीन कों, तुमहीं राखौ लार५ ॥३६६॥
(५. लार - साथ)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सभी अपनी अपनी पीड़ा बतलाते हैं और उसी के लिये प्रार्थना करते हैं । हे प्रभु दीन जन को तो आप ही सम्हालें ।
.
गुण तहां ओगुण६ ओगुण तहां गुण, मैं तैं नांहीं रांम ।
जगजीवन हरि एक रस, साध भजैं सब ठांम ॥३६७॥
{६. ओगुण - अवगुण, दुर्गुण(विकार)}
संतजगजीवन कहते हैं कि जहां गुण व्यापते हैं वहीं अवगुण है । वहां तुम, मैं न होकर सिर्फ राम ही हैं । और उन्हीं राम को साधु जन सब स्थानों पर भजते हैं ।
॥ इति परचा को अंग संपूर्ण ॥४॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें