शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

*(“चतुर्थोल्लास” ३७/३९)*

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
*(“चतुर्थोल्लास” ३७/३९)*
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*पूरब कोई जीव न सतावै,*
*कीजे गुनह(अपराध) न दंड लगावे ।* 
*विनही गुनह दंड क्यूं देई,*
*दया धरम करै सब कोई ॥३७॥* 
कोई भी किसी जीव को नहीं सताता कष्ट देता, साधारण अपराध करने पर भी राजा दंड नहीं देता । बिना अपराध किये कोई क्यूं दंड देगा, सब प्रजा दया धर्म का पालन करते हैं । कथा ज्ञान भक्ति का पालन करते हैं ॥३७॥ 
*घर घर में कथा सत्संग होने लगा* 
*घरि घरि कथा कीरतन होई,*
*दूजा देव आन नहीं कोई ।* 
*नर नारी मनुष जो सब ही,*
*आन धरम नहीं कीजै कब ही ॥३८॥* 
राजा के राज्य में घर घर हरि कथा व कीर्तन होते हैं हरि ब्रह्म के अतिरिक्त किसी दूसरे देव का ध्यान कथा, कीर्तन नहीं होता । नर नारी मानव सब ही सनातन ब्रह्म धर्म के अतिरिक्त कोई धर्म नहीं मानते ॥३८॥ 
*संध्या समै सुरही घरि आवै,*
*ऐसें दुनी सकल ही धावै ।* 
*ज्यूं मंत्र कै बसि वीर पुराई,*
*इन्द्र जोर ज्यूं घन बरषाई ॥३९॥* 
संध्या के समय जंगल से गायें घर को आती हैं तो लोग उनके स्वागत के लिये दौडते हैं । जिस प्रकार मंत्र के वश में वीरदेव होते हैं और इन्द्र के वश में वर्षा होती है इसी प्रकार जनता गायों के वश में है ॥३९॥
(क्रमशः)

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