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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ विश्वास का अंग १९ - १/४)
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*दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।*
*वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥१॥*
*दादू सहजैं सहजैं होइगा, जे कुछ रचिया राम ।*
*काहे को कलपै मरै, दुःखी होत बेकाम ॥२॥*
विधाता ने जीव के कर्मों के अनुसार जो सुख दुःख लिखना था, वह पहले ही लिख दिया है । उसी कर्मफल को धीरे-धीरे यथा समय जीव भोगता है । इसलिये प्रतिकूलता आने पर नाना तरह की कल्पना करके दुःखी नहीं होना चाहिये, क्योंकि हमारा ही किया हुआ हमें प्राप्त हो रहा है ।
महाभारत में लिखा है- “जीव इस जन्म में नया कर्म करके या यज्ञ करके नया फल प्राप्त नहीं कर सकता किन्तु विधाता ने भोगने के लिये जो फल दिये हैं, उन्हीं को जीव भोगता है । सुख-दुःख का देने वाला और कोई नहीं है किन्तु अपने ही कर्मफलों को भोगता है । अतः अपने ही किये हुए कर्मों का फल विधाता के द्वारा समय समय पर प्राप्त होता रहता है । अतः कल्पना करना व्यर्थ है ।”
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*सांई किया सो ह्वै रह्या, जे कुछ करै सो होइ ।*
*कर्ता करै सो होत है, काहे कलपै कोइ ॥३॥*
कर्मानुसार भगवान् ने जो हमारे लिये विधान किया है, वह ही हो रहा है, आगे भी वह ही होगा । अतः व्यर्थ कल्पना करके क्यों दुःखी हो रहे हो ?
महाभारत में- “मन चाहा सुख किसी को भी नहीं मिलता, क्योंकि सुख दुःख ये सब दैव(भाग्य) के अधीन हैं । अतः जीव को संतोष रखना चाहिये, अधिक की इच्छा न करे ।”
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*दादू कहै जे तैं किया सो ह्वै रह्या, जे तूं करै सो होइ ।*
*करण करावण एक तूं, दूजा नांहीं कोइ ॥४॥*
हे प्राणी ! हम सत्य कहते हैं कि तूने पहले जैसे कर्म किये, उन्हीं कर्मों का सुख-दुःखरूपी फल मिल रहा है । इस समय जो करोगे, उनका फल अगले जन्म में भोगने को मिलेगा । अतः सुख दुःख देने वाले कर्मों के कर्ता तुम ही हो, दूसरा नहीं ।
महाभारत में लिखा है कि- “यदि मनुष्य अपनी बुद्धि बल से व शास्त्रों के अध्ययन से कोई फल विशेष चाहता हो तो उसको नहीं मिलता और मूर्ख भी कभी-कभी अच्छे पदार्थों को प्राप्त कर लेता है । यह काल कार्यमात्र के प्रति निर्विशेष(सामान्य) कारण है । अतः बिना समय के कोई भी फल प्राप्त नहीं कर सकता । जब तक मनुष्य के अभ्युदय का समय नहीं आता, तब तक न तो वृक्षों के फल आते, न मन्त्र कारीगरी तथा न औषधि ही फल देती । फल भोगने का समय आने पर वे अपने आप प्राप्त हो जाते हैं तथा अभ्युदय का समय आने पर अपने आप बढ़ जाते हैं ।
समय पर ही तेज हवायें चलती हैं, समय से ही वर्षा बरसती है, समय से ही कमल खिलता है, समय से ही वनों में पुष्प आते हैं, समय से ही दिन-रात, कृष्णपक्ष-शुक्लपक्ष तथा पूर्ण चन्द्रोदय होता है । बिना समय के तो वृक्षों में फलफूल भी नहीं आते और बिना समय के नदियां भी नहीं बहती है । समय आने पर सब कुछ अपने आप हो जाता है । अतः कल्पना करना व्यर्थ है ।”
(क्रमशः)

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