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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*७. हैरान कौ अंग ~ ९/१२*
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सकल करै सो रांम है, अकल कल्या नहिं जाइ ।
जगजीवन हैरान सब, थकित भये ल्यौ लाइ ॥९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कर्ता सब के राम ही हैं । कोइ अन्य कुछ नहीं है सब परमात्मा से लगन लगा कर थक गये हैं, हैरान हैं ।
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उतपति नहीं सो आप हैं, कोइ जांणै किहि अंग ।
कहि जगजीवन साध सब, प्रेम पिवै पिव संग ॥१०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो कभी ना जन्मे वह परमात्मा है चाहे कोइ उन्हें किसी भी स्वरूप में जाने संतों के तो वे ही प्रियतम हैं सभी साधु जन उनसे ही प्रेम पाते हैं ।
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आपै आप अलेख हैं, उपज्या नहीं सो रांम ।
कहि जगजीवन अकरता, सकल करै सब ठांम ॥११॥
संतजगजीवन जी महाराज कहते हैं कि परमात्मा की किसी भी महिमा को पूरा नहीं लिखा जा सकता वह अलेख है अपार होने से । जन्म से परे है वे बिना किये ही सब करते हैं सब स्थानों पर करते हैं । उनसे परे कोइ स्थान नहीं है ।
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आदि अंत अबिगति अलख, सहज पिछांणै कोइ ।
कहि जगजीवन क्यों रहै, क्यों है किहिं मति सोइ ॥१२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि आदि से अंत तक प्रभु की विलक्षण लीला है उसे सहज में ही कोइ नहीं जान सकता वह बुद्धि से भी परे है ।
(क्रमशः)

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