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*काया नगर निधान है, माँही कौतिक होइ ।*
*दादू सद्गुरु संग ले, भूल पड़े जनि कोइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. ३५८)*
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*साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)*
*साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ*
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(२)
*‘मृण्मयी आधार में चिन्मयी देवी’* – विष्णुपुर में मृण्मयी का दर्शन
लगभग दो या तीन बजे होंगे । इसी समय भक्तवीर अधर सेन तथा बलराम आ पहुँचे और भूमिष्ठ हो प्रणाम कर बैठ गए । उन्होंने पूछा, “आपकी तबियत कैसी है?” श्रीरामकृष्ण ने कहा, “हाँ, शरीर तो अच्छा ही है, पर मेरे मन में थोड़ी व्यथा हो रही है ।” इस अवसर पर हृदय की तकलीफ के सम्बन्ध में कोई बात ही नहीं उठायी ।
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बड़ा बाजार(कलकत्ते) के मल्लिक-घराने की सिंहवाहिनी देवी की चर्चा छिड़ी ।
श्रीरामकृष्ण- मैं भी सिंहवाहिनी के दर्शन करने गया था । चासाधोबीपाड़ा के एक मल्लिक के यहाँ देवी विराजमान थीं । मकान टूटा-फूटा था, क्योंकि मालिक गरीब हो गये थे । कहीं कबूतर की विष्ठा पड़ी थी, कहीं काई जम गयी थी, और कहीं छत से सुरखी और रेत ही झर-झरकर गिर रही थी । दूसरे मल्लिक घरानेवालों के मकान में जो श्री देखी वह श्री इसमें नहीं थी ।
(मास्टर से)- “अच्छा, इसका क्या अर्थ है, बतलाओ तो सही ।”
मास्टर चुप्पी साधे बैठे रहे ।
श्रीरामकृष्ण- बात यह है कि जिसके कर्म का जैसा भोग है, उसे वैसा ही भोगना पड़ता है । संस्कार, प्रारब्ध आदि बातें माननी ही पड़ती हैं ।
“उस टूटे-फूटे मकान में भी मैंने देखा कि सिंहवाहिनी का चेहरा जगमगा रहा है ! आविर्भाव मानना ही पड़ता है ।
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“मैं एक बार विष्णुपुर गया था । वहाँ राजासाहब के अच्छे अच्छे मन्दिर आदि हैं । वहाँ मृण्मयी नाम की भगवती की एक मूर्ति है । मन्दिर के पास ही कृष्णबाँध, लालबाँध नाम के बड़े बड़े तालाब हैं । तालाब में मुझे उबटन के मसाले की गन्ध मिली ! भला ऐसा क्यों हुआ ? मुझे तो मालुम भी नहीं था कि स्त्रियाँ जब मृण्मयी देवी के दर्शन के लिए जाती हैं तो उन्हें वे वह मसाला चढ़ाती हैं ! तालाब के पास मेरी भाव-समाधि हो गयी । उस समय तक विग्रह नहीं देखा था – भावावेश में मुझे वहीँ पर मृण्मयी देवी के दर्शन हुए – कटि तक ।”
(क्रमशः)

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