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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग वसँत २३(गायन समय प्रभात ३ से ६ तथा वसँत ॠतु)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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३७१ - **परिचय** । षड़ताल
मन मोहन मेरे मन ही मांहिं,
कीजै सेवा अति तहां ॥टेक॥
तहं पायो देव निरँजनां,
परगट भयो हरि यह तना ।
नैनन हीं देखूँ अघाइ,
प्रकट्यो है हरि मेरे भाइ ॥१॥
मोहि कर नैनन की सैन देइ,
प्राण मूंसि हरि मोर लेइ ।
तब उपजै मोकों इहै बानि,
निज निरखत हूं सारँगपानि ॥२॥
अँकुर आदैं प्रकट्यो सोइ,
बैन बाण तातैं लागे मोहि ।
शरणै दादू रह्यो जाइ,
हरि चरण दिखावै आप आइ ॥३॥
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साक्षात्कार की स्थिति बता रहे हैं - मेरे मनमोहन भगवान् मन में ही स्थित हैं, उनकी सेवा - पूजा वहां मन में ही विशेष रूप से करनी चाहिए ।
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वहां ही हमने निरंजन देव को प्राप्त किया है । वे हरि दया करके इस शरीर के हृदय - देश में मेरे भावाधीन ही प्रकट हुये हैं, मैं उन्हें ज्ञान – नेत्रों से तृप्त१ देखता हूं ।
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वे हरि ध्यानावस्था में मुझे अपने से अभिन्न करने के लिए, अपने हाथ और नेत्रों की सैन देते हैं तथा मेरे मन को चुरा लेते हैं । तब मेरे हृदय में अद्वैत रूप से देखने का स्वभाव उत्पन्न हो जाता है फिर मैं भगवान् को निज स्वरूप ही देखने लगता हूं । यह अद्वैत स्वभाव बीज रूप से मुझ में आदि काल का ही है ।
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उसी का भक्ति रूप अंकुर प्रकट हुआ है । इस अंकुर के प्रकट होने से ही मेरे सद्गुरु के वचन - बाण लगे हैं और मैं हरि की शरण होकर, भजन द्वारा उनके पास ही जा रहा हूं । तब ही तो स्वयँ हरि आकर अपने चरणों का दर्शन कराते हुये मुझे अपने से अभिन्न कर रहे हैं ।
(क्रमशः)

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