रविवार, 20 सितंबर 2020

= *कृतघ्नी निगुणा का अंग १२४(१/४)* =

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*साहिबजी सब गुण करै, सतगुरु मांही आइ ।*
*दादू राखै जीव दे, निगुणा मेटै जाइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*कृतघ्नी निगुणा का अंग १२४*
इस अंग में कृतघ्नी और गुण न मानने वाले निगुरे नरों संबंधी विचार कर रहे हैं ~ 
जन रज्जब गुण चोर का, कबहुं भला न होय । 
सदगुरु का कृत हन्तकरि, सीझ्या१ सुण्या कोय ॥१॥ 
गुण को चुराने वाले का कभी भी भला नहीं होता, सदगुरु के किये हुये उपकार को हत कर अर्थात न मान कर कोई भी मुक्त१ हुआ नहीं सुना है । 
साधौं के गुण चोर को, कहो कहाँ है ठोर । 
माया में भी मारिये, रज्जब चोरी चोर ॥२॥ 
संतों के ज्ञानादि गुणों को चुराने अर्थात ज्ञान सीख कर उपकार न मानने वाले के लिये तुम ही कहो कहाँ स्थान है ? अर्थात ब्रह्म स्वरूप में तो है नहीं । मायिक संसार में भी चोरी करने वाले चोर को पीटा ही जाता है । 
जैसे अंध उलूक गति, रवि गुण मानैं नाँहिं । 
रज्जब रजनी ह्वै गई, विद्यमान दिन माँहिं ॥३॥ 
जैसे अंधा उल्लू सूर्य के प्रकाश गुण को नहीं मानता तब उसके लिये दिन के होते हुवे भी रात्रि हो जाती है वैसे ही कृतघ्नी उपकार नहीं मानता तब उसकी भी वही गति होती है अर्थात ज्ञान की बातें जानते हुये भी उसमें अज्ञान ही रहता है । 
विद्या लेय विहंग१ की, वक्त्र२ सु बरछी३ झेल । 
रज्जब नटतों नाम नट, अरि४ उर बैठा सेल५ ॥४॥ 
मुख२ पर भाला३ झेलने की विद्या पक्षी१ से लेकर नट को उसका नाम नहीं बताकर नट गया, तब उस नट४ के शत्रु के हृदय में भाला४ धुस गया । 
दृष्टान्त कथा - एक पशु चराने वाले लड़के ने तालाब पर एक दिन देखा कि -बगला मच्छी पकड़ कर आकाश में उछालता है और फिर उसे चूंच में पकड़ लेता है । लड़के भी उसके देखा देखी अपनी लकड़ी दाँतों पर झेलने का अभ्यास कर लिया । 
एक दिन उसके गांव में नट आया और उसने भाले को आकाश में उछालकर दाँतों पर झेलने का खेल दिखाया, उसे देखकर उक्त लड़के ने कहा - "इसमें क्या बड़ी बात है ? यह तो मैं भी झेल सकता हूँ" । नट ने कहा - "झेल" उसने झेल लिया । नट ने पुछा - "तेरा गुरु कौन है" ? वह बोला - "कोई नहीं मैंने तो अपने आप ही सीखा है", नट ने कहा - "तब एक बार फिर झेल ।" अबकी बार सेल दाँतों पर न पड़कर हृदय में जा धुसा । यदि यह बता देता कि - बगले से सीखा है तो ऐसा नहीं होता ।
(क्रमशः)

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