गुरुवार, 10 सितंबर 2020

*(“चतुर्थोल्लास” १६/१८)*

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
*(“चतुर्थोल्लास” १६/१८)*
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*कैद से सबको छुड़ा दिया*
*कैद के बंदी परे छुडाये,*
*ऐसे संत सबनि को भाये ।* 
*पुत्र सबै ही यहु मत कीन्हा,*
*जन्मत ही हम बंदी दीन्हा ॥१६॥*
केद जेल के सभी बंदियों को छुडा दिया इस प्रकार संत सभी को अच्छे लगे । सभी पुत्रों ने यह अपना एक मत कर लिया कि हम लोगों को राजा ने जन्मते ही बंदी बना लिया ॥१६॥ 
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*भागि हमारे हरिजन आये,*
*पर उपगारी आन छुडाये ।* 
*तन मन प्राण तिन्हौं को दीजे,*
*सुनो सकल ही यहुमत कीजै ॥१७॥* 
पर उपकार करने वाले संत हमारे भाग्य से यहां पधारे और उन्होंने हमें कैद से छुडा दिया । अब हम सब का एक ही मत विचार है, यह सुनलो कि हम अपने तन, मन और प्राण उन्हीं संतों की सेवा में समर्पित करेगें ॥१७॥ 
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*चले सकल संगि ले राऊ,*
*देख्यौ दर्शन बहु सुख पाऊ ।* 
*प्रेम सहित पुनि लीन्ही दीक्षा,*
*पर उपगारी दीन्ही दीक्षा ॥१८॥* 
राजा अपने सभी संबधी, मित्रों और साथियों को लेकर संत जी के पास चले और उन संतों के दर्शन कर बहुत सुख व आनंद प्राप्त किया । और फिर श्रद्घा प्रेम के साथ संतों से दीक्षा ली । उपकारी संतों ने भी उन्हें सहर्ष दीक्षा दी ॥१८॥
(क्रमशः)

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