🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ विचार का अंग २२/२५)
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*॥ शिष्य जिज्ञासा ॥
*प्रश्न -*
*दादू क्षुधा तृषा क्यों भूलिये, शीत तप्त क्यों जाइ ? *
*क्यों सब छूटैं देह गुण ? सतगुरु कहि समझाइ ॥२२॥*
*उत्तर -*
*मांही थैं मन काढ कर, ले राखै निज ठौर ।*
*दादू भूलै देह गुण, बिसर जाइ सब और ॥२३॥*
हे सद्गुरो ! भूख प्यास इन प्राणधर्मों से तथा शीत, उष्णादि शरीर धर्मों से यह जीव कैसे मुक्त हो सकता है ? शिष्य के इन प्रश्नों का उत्तर दे रहे हैं-
जैसे सुषुप्ति में मन का शरीर से सम्बन्ध न रहने से देहादिगुण नहीं प्रतीत होते, वैसे ही जाग्रत अवस्था में भी यदि मन परमात्मा में जो हृदय में स्थित हैं, लीन हो जाय तो स्थूल सूक्ष्मदेह के कोई भी धर्म नहीं व्याप सकते हैं, क्योंकि उस समय मन ब्रह्म में लीन हो जाता है । यह प्रश्न संपूर्ण दृश्य के विषय में समझना और उत्तर का भी यही अभिप्राय है कि यह दृश्य मन की ही कल्पना है अर्थात् मन से ही पैदा होता है और जब मन ब्रह्म में लीन हो जायेगा तो फिर दृश्यजात की निवृत्ति अपने आप ही हो जायेगी ।
वासिष्ठ में- “हे राम ! जैसे शून्य तथा जड़ आकार वाले आकाश का नाम मात्र से अतिरिक्त दूसरा कोई रूप दृष्टिगोचर नहीं होता, उसी प्रकार शून्य एवं जड़रूप इस संकल्पात्मक मन का नाम के सिवा कोई वास्तविक रूप नहीं दीखता है । यह जगत् क्षणिक संकल्परूपी मन से उत्पन्न हुआ है । मृगतृष्णा में प्रतीत होने वाले जल तथा चन्द्रमा में भ्रम से दीखने वाले द्वितीय चन्द्रमा के समान ही इस मनःकल्पित जगत् का स्वरूप है ।
हे राम ! जिस विषय के लिये संकल्प होता है, उसमें मन संकल्परूप से स्थित रहता है । अतः जो संकल्प है, वह ही मन है । संकल्प और मन को कोई कभी अलग नहीं कर सकता । अतः मन को ही संकल्प समझो ।
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*नाम भुलावै देह गुण, जीव दशा सब जाइ ।*
*दादू छाड़ै नाम को, तो फिर लागै आइ ॥२४॥*
सतत हरिनाम का स्मरण करने से मन की ध्येयाकार वृत्ति बन जाती है और उस वृत्ति से जीव का सम्बन्ध नष्ट होने से देह के गुण सब स्वयं ही निवृत्त हो जाते हैं । कर्तृत्व भोक्तृत्व रूप जीवभाव भी ब्रह्म में मन के लीन होने से नष्ट हो जाता है और जब ही नाम की विस्मृति होने लगती है, तब मन का फिर शरीर सम्बन्ध होने से जीवभाव को प्राप्त हो जाता है । अतः हरिनाम का चिन्तन सतत होना चाहिये ।
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*दादू दिन दिन राता राम सौं, दिन दिन अधिक स्नेह ।*
*दिन दिन पीवै रामरस, दिन दिन दर्पण देह ॥२५॥*
जब प्रतिदिन बढ़ते हुए प्रेम से दिन रात ब्रह्म में अपने मन को अनुरक्त कर साधक रामरस पीता है तो उसका अन्तःकरण दर्पण की तरह निर्मल हो जाता है ।
(क्रमशः)

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