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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्थोल्लास” २५/२७)*
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*भाव हीन भोजन नहीं खावें,*
*आन देव जो होम करावे ।*
*कारत्यों, कनागत छाडों सब ही,*
*हरि जन होई सु त्यागे तब ही ॥२५॥*
संत लोग भाव श्रद्घा के बिना दिया भोजन नहीं करते और हरि के अतिरिक्त देवी, भैरू आदि देवों के निमित जो होम किया जाता है उसका भोजन नहीं करते इसी प्रकार मृत्यु भोज श्राद्घ आदि का भोजन भी नहीं करते है । शुद्घ सात्विक भोजन ही लेते हैं ॥२५॥
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*अश्वमेघ ग्रहण तुला को द्रबू,*
*भगत अनन्य सु त्यागे श्रबू ।*
*तुम जो माया इहां लगाई,*
*काग विष्ट सम दीसे राई ॥२६॥*
अश्वमेध यज्ञ, ग्रहण का द्रव्य एवं संक्रांति पर्व का पदार्थ जो हरि के अनन्य भक्त होते हैं वे इन सब पदार्थ को त्याग देते हैं । इनका दान ग्रहण नहीं करते । हे राजन् आपने आश्रम निर्माण में जो माया लगाई है वह काग की विष्ठा के समान दिखाई देती है ॥२६॥
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*तुम ही कही काग की विष्टू,*
*माया मुक्ति होई जग पुष्टू ।*
*दुर्गन्ध कर्म सब कोइ भाजे,*
*कूकर, काग, स्याल, नही लाजे ॥२७॥*
राजा ने कहा कि आपने ही माया को काग की विष्टा कहा है सारा संसार तो इसी माया से पुष्ट होता है बढता है । संत ने कहा दुष्ट व दुगर्न्ध कर्मो से सब दूर भागते हैं केवल कुत्ता, काग सियार आदि मांस भक्षक जानवर ही इनसे दूर नहीं होते । अच्छे प्राणी इनके पास नहीं जाते ॥२७॥
(क्रमशः)

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