रविवार, 13 सितंबर 2020

विचार का अंग ३५/३८

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ विचार का अंग ३५/३८)
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*जब समझ्या तब सुरझिया, उलट समाना सोइ ।*
*कछु कहावै जब लगै, तब लग समझ न होइ ॥३५॥*
जब साधक ब्रह्म विचार से अपने स्वरूप को जान जाता है, तब वह ‘तेरे-मेरे’ भाव से मुक्त होकर सर्वत्र ब्रह्मदृष्टि करने से वह ब्रह्मरूप हो जाता है । इसलिये साधक के अन्तःकरण में यदि थोड़ी सी भी ‘तेरी-मेरी’ भावना शेष रह जाती है तो समझना चाहिये कि अभी ज्ञान नहीं हुआ है, क्योंकि ज्ञान होने पर तुच्छ ‘तव-मम’ भावना उत्पन्न ही नहीं हो सकती ।
योगवासिष्ठ में लिखा है- “जैसे मृग तुच्छ तृणों के लोभ से उगे जाकर गड्ढों में गिर पड़ते हैं, उसी प्रकार अन्तःकरण की वृत्तियां निस्सार विषयों द्वारा ठगी जाती हैं और विक्षेपरूपी दुःखों को भोगने के लिये उनके गहरे खड्डे में गिर जाती हैं । क्योंकि अविवेकी पुरुषों के आश्रित रहने वाली चक्षु आदि इन्द्रियाँ कष्टमय संसार में भोगों को भोगने में ही लगी रहने के कारण उनका भोगों से दृढ़परिचय हो जाता है और फिर दृढ़भोगों की वासना के कारण सत्परमात्मा में नहीं लगती और संसाररूपी अंधकूप में गिरी रहती हैं ।” 
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*जब समझ्या तब सुरझिया, गुरुमुख ज्ञान अलेख ।*
*ऊर्ध्व कमल में आरसी, फिर कर आपा देख ॥३६॥*
अपने अन्तःकरण को श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन द्वारा मलविक्षेप के आवरण से रहित करके आत्मज्ञान को गुरुमुख से प्राप्त करना चाहिये, जिससे प्रतिदिन प्रभुप्रेम एवं भक्ति में वृद्धि होती रहे । (यहाँ गुरुमुख से आत्मज्ञान प्राप्ति का संकेत दिया गया है ।)
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*प्रेम भक्ति दिन दिन बधै, सोई ज्ञान विचार ।*
*दादू आतम शोध कर, मथ कर काढ़या सार ॥३७॥*
अपने अन्तःकरण को श्रवण मनन निदिध्यासन के द्वारा आवरण आदि दोषों से रहित गुरुमुख से आत्मज्ञान प्राप्त करो । जिस ज्ञान से प्रतिदिन प्रभु में प्रेम भक्तिभाव बढ़े ।
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*दादू जिहिं बरियां यहु सब भया, सो कुछ करो विचार ।*
*काजी पंडित बावरे, क्या लिख बांधे भार ॥३८॥*
फतेहपुर-सीकरी नगर में अकबर बादशाह की सभा में ‘ईश्वर है या नहीं’ इस विषय पर पण्डितों और काजियों का विवाद चल रहा था । उसको सुनकर उनको समझाते हुए श्रीदादूजी महार्राज कहने लगे “हे विद्वानो ! क्या आप लोग इस सृष्टि को नहीं देख रहे हैं ! इस सृष्टि का बनाने वाला जो सर्वसमर्थ है, वह ही परमात्मा है । सृष्टि से पहले, पीछे, मध्य में भी वह अविनाशी होने से सदा रहता है । उपनिषदों में कहा है कि-
हे सौम्य, इस सृष्टि से पहले एक अद्वितीय ब्रह्म ही था । उसी से यह प्राण, मन, सब इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी जो सबको धारण करने वाली है, सब उसी से बने हैं । इत्यादि श्रुतियों से ईश्वर तो निर्विवाद सिद्ध है । प्रत्यक्षवस्तु में कोई प्रमाण की भी आवश्यकता नहीं होती । अतः आप लोग व्यर्थ में ही क्यों पुस्तकों के भार से दुःखी होते हो ? इस भार को त्यागो और ईश्वर को भजो, क्योंकि वादविवाद से किसी को भी परमात्मा नहीं मिलता ।”
(क्रमशः)

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