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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग सूहा २२(गायन समय दिन ९ से १२)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**काया बेली ग्रन्थ**
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३६३ - राज विद्याधर ताल
काया मांहीं देख्या नूर,
काया मांहीं रह्या भरपूर ।
काया मांहीं पाया तेज,
काया मांहीं सुन्दर सेज ॥१॥
काया मांहीं पुँज प्रकाश,
काया मांहीं सदा उजास ।
काया मांहीं झिलमिल सारा,
काया मांहीं सब तैं न्यारा ॥२॥
काया मांहीं ज्योति अनन्त,
काया मांहीं सदा बसन्त ।
काया मांहीं खेलैं फाग,
काया मांहीं सब वन बाग ॥३॥
काया मांहीं खेलैं रास,
काया मांहीं विविध विलास ।
काया मांहीं बाजैं बाजे,
काया माँहीं नाद धुनि साजे ॥४॥
काया मांहीं सेज सुहाग,
काया मांहीं मोटे भाग ।
काया मांहीं मंगल चार,
काया मांहीं जै जै कार ॥५॥
काया अगम अगाध है,
माँहीं तूर बजाइ ।
दादू परगट पीव मिल्या,
गुरुमुख रहे समाइ ॥६॥
इति राग सूहा(काया बेली ग्रँथ) समाप्त: ॥२२॥पद १०॥
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**= काया माँहीं देख्या नूर =**
सँतों ने ब्रह्म स्वरूप का साक्षात्कार काया में ही किया है ।
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**= काया माँहीं रह्या भरपूर =**
ब्रह्म व्यापक होने से काया के नख से शिखा पर्यन्त रोम - रोम में परिपूर्ण है ।
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**= काया मांहीं पाया तेज =**
ऋषियों ने ब्रह्म - तेज भी काया में रहते ही पाया था ।
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**= काया माँहीं सुन्दर सेज =**
शरीर में ही सबसे अधिक सुन्दर हृदय शय्या है ।
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**= काया मांहीं पुँज प्रकाश =**
साधन द्वारा काया में ही प्रकाश राशि भासती है ।
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**= काया मांहीं सदा उजास =**
शरीर में सदा ज्ञान रूप प्रकाश रहता है ।
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**= काया माँहीं झिलमिल सारा =**
शरीर में ध्यानावस्था के समय विश्व के सार ब्रह्म ज्योति की झिलमिलाहट देखने में आती है, अत: शरीर में ही है ।
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**= काया माँहीं सब तैं न्यारा =**
ब्रह्मात्मा काया में रह कर भी सब से अलग ही है ।
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**= काया माँहीं ज्योति अनन्त =**
जिसका अन्त नहीं आये, ऐसी आत्म ज्योति काया में ही है ।
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**= काया माँहीं सदा बसँत =**
शरीर में ब्रह्म साक्षात्कार होने पर सदा वसँत के समान आनंदोत्सव ही रहता है ।
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**= काया माँहीं खेले फाग =**
सँतजन काया में ही अपने प्रियतम प्रभु से परम प्रेम रूप फाग का खेल खेलते हैं ।
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**= काया माँहीं सब वन बाग =**
जैसे ब्रह्माँड में नन्दनवनादि हैं वैसे ही शरीर में सँकल्पवन - मन, विचार – वन बुद्धि इत्यादिक सब वन और ज्ञान - बाग शरीर में है ।
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**= काया माँहीं खेलैं रास =**
साक्षी चेतन रूप कृष्ण और वृत्ति रूप गोपिकाएँ शरीर में रास खेलते हैं ।
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**= काया माँहीं विविध विलास =**
शब्दानन्द, रूपानन्द, गँधानन्द रसनान्द आदि विविध भाँति के सुख काया में हैं ।
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**= काया माँहीं बाजै बाजे =**
अखँड नाम चिन्तन रूप बाजे सँतों के रोम रोम में बजते हैं ।
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**= काया माँहीं नाद धुनि साजे =**
काया में ही अनाहत ध्वनि सजाई जाती है अर्थात् क्रम से स्थूलध्वनियों से सूक्ष्म ध्वनियों में मन लगाया जाता है ।
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**= काया माँहीं सेज सुहाग =**
शरीर में ही हृदय शय्या पर प्रभु साक्षात्कार रूप सुहाग सुख होता है ।
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**= काया माँहीं मोटे भाग =**
काया में साधन करने से मानव बड़ भागी बनता है ।
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**= काया मांहीं मँगलचार =**
ब्रह्म प्राप्ति होने पर काया में अति आनन्द रूप मँगल का ही व्यवहार होता है ।
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**= काया माँहीं जै जैकार =**
काया में ही आसुर गुणों को विजय करने पर जयकार वाली ध्वनि होने लगती है ।
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**= काया अगम अगाध है, माँहीं तूर बजाइ । =**
**= दादू परकट पीव मिल्या, गुरुमुख रहे समाइ । =**
जैसे ब्रह्माँड अगम अगाध है, वैसे ही काया भी अगम अगाध है । हमने काया में ही अनाहत ध्वनि रूप नगाड़ा बजा कर मन को स्थिर किया, तब काया में ही प्रत्यक्ष रूप से प्रभु की प्राप्ति हुई है । इस प्रकार गुरुमुख द्वारा श्रवण करी पद्धति से साधन करके शरीर में ही हम प्रभु से मिले और उसी में वृत्ति द्वारा समा रहे हैं ।
इति श्री दादू गिरार्थ प्रकाशिका राग सूहा(काया बेली ग्रँथ) समाप्त: ॥ २२ ॥
(क्रमशः)

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