गुरुवार, 3 सितंबर 2020

= *वक्त ब्यौरा का अंग १२२(६१/६३)* =

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*दादू कोटि अचारिन एक विचारी, तऊ न सरभर होइ ।*
*आचारी सब जग भर्या, विचारी विरला कोइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*वक्त ब्यौरा का अंग १२२*
दाता दिल दरियाव, भाव भला सब त्याग१ का ।
मैं मंगित२ कर आव, जेतक३ भंजन४ भाग५ का ॥६१॥
समुद्र में देने का भाव अच्छा है चाहे कोई कितना ही जल ले सकता है किन्तु लेने वाले के पास जितना३ बड़ा बर्तन४ है उतना ही ले सकेगा । वैसे ही प्रभु रूप दाता तो बहुत उदार हैं, उनमें सभी कुछ देने१ का भाव बहुत अच्छा है किन्तु माँगने२ वाले हाथ तो उतना ही आयेगा जितना उसका भाग्य५ है ।
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उदार अधिक नदीनाथ१, से जिन माँहि बहु वस्त ।
पै रज्जब बासण२ बखत का, तेता आवे हस्त ॥६२॥ 
जिसमें बहुत वस्तुयें है, उस समुद्र१ से ही भी उदार व्यक्ति अधिक होता है किन्तु वक्त का बर्तन२ होगा, अर्थात भाग्य जितना होगा, उतना ही हाथ में आयेगा ।
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बाब१ सरै२ तो तन सुखी, सूंघण हार हुं दु:ख ।
तथा संपदा देखिकर, आपद मौड़े मुख ॥६३॥
जिसका अपान वायु१ निकलता२ है उसे तो सुख होता है किन्तु उसकी दुर्गंध का सम्बंध जिसके नाक से होता है उसे दु:ख होता है, वह दु:ख से मुख मोड़ता है, वैसे ही सम्पति को देखकर आपदा मुख मोड़ती है, यह सब समय से होता है, यही समय का विवरण है ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित वक्त ब्यौरा का अंग १२२ समाप्तः ॥सा. ३९६३॥
(क्रमशः)

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