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🌷 *#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु* 🌷
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*राम कहै जिस ज्ञान सौं, अमृत रस पीवै ।*
*दादू दूजा छाड़ि सब, लै लागी जीवै ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ लै का अंग)*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु*, *बुद्धि-मूर्खता*
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पूर्व पुण्य से सहज ही, होत शास्त्र का ज्ञान ।
पढे साथ तो भी हुये, निश्चल अति विद्वान ॥७२॥
पण्डित निश्चलदास जी के साथ अन्य भी कई छात्र पढते थे, किन्तु जैसा शास्त्रज्ञान निश्चलदासजी को हुआ वैसा अन्य किसी भी साथी को न हुआ । यह उनके पूर्वपुण्य का ही प्रताप था ।
एक बार पंडित निश्चलदासजी जी महाराज के दो विद्वान विद्यार्थी शौच गये थे । दो विशाल झुण्ड भेड़ों को देखकर एक गडरिये से पूछा - "जब ये दोनों झुण्ड मिल जाते होंगे तब तुम इन्हें कैसे पहिचानते हो ? गडरिया - "हम तुम्हारे समान मूर्ख तो नहीं है जो अपनी वस्तु को भी न पहिचान सके ।" यह सुनकर दोनों चुपचाप आ गये और महाराज निश्चलदासजी से कहा । उन्होने कहा - "गडरिये ने ठीक तो कहा है, जिस विषय में हम न समझे उसमें तो मूर्ख ही है, इसमें दुख की क्या बात है ।
जो जिसमें समझे नहीं, उसमें मूरख सोय ।
वचन गडरिया श्रवण कर, क्षुब्ध भये बुध दोय ॥२६६॥

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