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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*५. परचा कौ अंग ~ ३५३/५६*
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अंतहकरण अगाध है, रांम नांम प्रकास ।
तहां सब सूझै सेव हरि, सु कहि जगजीवनदास ॥३५३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि अतंकरण में जो व्याप्त है वह अगाध है उसकी गहराई की थाह नहीं पा सकते वहां राम नाम का उजाला है । वहाँ सिर्फ हरि सेवा ही दिखती है ।
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ह्रिदै सुधा रस पीजिये, रांम मिलै संत भाइ ।
कहि जगजीवन नांम महि, तीन४ पांच५ ले आइ ॥३५४॥
(४. तीन - सत्त्व, रज, तम - ये तीन गुण) (५. पाँच - चक्षु आदि पाँच ज्ञानेन्द्रिय)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हृदय में अमृत रस का पान करें तो राम आवश्य मिलेंगे । ये अमृत रस राम नाम है । जिसमें तीन गुण एवं पांच चक्षु यानि हमारी ज्ञानेन्द्रियां लगी है ।
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कहि जगजीवन रांम मिलि, आंन न परसै जाइ ।
उर मंहि आनंद ऊपजै, अंग परस जिव होइ ॥३५५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जिसे राम मिल जाते हैं उसे अन्य कोइ छू भी नहीं सकता । उसके अतंर में आनंद रहता है प्रभु सानिध्य बना रहता है ।
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हेत हिये६ हरि सूं किया, आप दिया तहँ रांम ।
कहि जगजीवन सेज सुख, सो नित बिलसै ठांम ॥३५६॥
(६. हेत हिये - हार्दिक स्नेह)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु कृपा से ही प्रभु सानिध्य, स्नेह मिलता है । और उससे मन उल्लासित रहता है ।
(क्रमशः)

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