बुधवार, 2 सितंबर 2020

*(“तृतीयोल्लास” ५२/५४)*

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
*(“तृतीयोल्लास” ५२/५४)* 
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*राजा और ब्राह्मण समर्पण*
अब है लाज हमारी तुमको, करो भया निस्तारो हम को । 
सुनो राव, चले नहीं इष्टू, विगरे काज होई जो भिष्टू ॥५२॥ 
विप्र ने कहा हे संतों अब तो हमारी लाज रक्षा आपके ही हाथों में है अत: दया करके हम को दुष्कर्मों से हटाकर हमारा कल्याण करो । ज्ञान व माणक ने कहा हे राव सुनो जो अपने इष्ट के अनुसार नहीं चलता है वह पथभ्रष्ट हो जाता है उसके सब कर्म बिगड़ जाते हैं ॥५२॥ 
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*राजा ज्ञान सुनकर त्याग व्रति*
राव कहै छाडौं सब राजू, ज्यूं त्यूं गुरुजी कीजे काजू । 
कहौ तो मरुं खांडे की धारा, पारख(परीक्षा) लई वचन विस्तारा ॥५३॥ 
राजा ने कहा मैं अपना सब राजपाट छोड़ दूंगा, जैसे तैसे भी आप हमारा उद्धार का कार्य करिये । आप कहों तो मैं खड़ग से अपना सिर काट लूं मर जाऊं यह आप परीक्षा करके देख ले और आज्ञा करें ॥५३॥ 
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*राजा की परिक्षा लेना*
कौन राव सोच मन करिहै, खड़ग मारि क्यूं न मरि है । 
मार्यो खड़ग कर्यो नहीं वारु, तेजवंत तै दूजै मारु ॥५४॥ 
ज्ञान व माणक ने कहा कि राजा सोच मन में क्या करते हो अपने गले पर खड़ग क्यों नहीं मार लेते । इस पर राजा ने अपने शरीर पर खड़ग चलाया । किन्तु उसका बाल भी नहीं कटा, तब उसने पूरे तेजबल से दूसरी बार खड़ग अपने पर चलाया ॥५४॥ 
(क्रमशः)

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